शनिवार, 16 मई 2020

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक्त नहीं, ना ही निम्न वर्ग की तरह रोज़ कुआं खोद कर प्यास बुझाने को अभिशप्त। फिर भी अपने निश्चित दुखों के सहारे सुख के साधन ढूंढता, गरीबी की सारी पहचान पर दिखावटी चादर डालकर अमीर अनुभव करने के स्वप्न सुख में डूबा हुआ 'मध्यमवर्ग'।

यक़ीन मानिए एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति बुरा नहीं होता लेकिन उसका संतोषधन तब किसी काम का नहीं रहता, जब उसे खींच-खींच के बाज़ार में सिर्फ़ यह दिखाने के लिए खड़ा कर दिया जाता है कि उसके पड़ोसी के घर उससे ज़्यादा बड़ी गाड़ी, उससे ज़्यादा बड़ा घर, उससे ज़्यादा बैंक बैलेंस मौजूद है। उसका सारा जीवन पड़ोसी की बराबरी करने में निकलता है लेकिन हाँ, वह फिर भी बुरा नहीं होता। आप यह भी कह सकते हैं कि उसके पास बुरा होने के लिए पर्याप्त वक़्त नहीं होता। अपनी रोज़ी-रोटी के लिए 12 घंटे के व्यवसाय या फिर 8 घंटे की नौकरी में उलझा यह मध्यमवर्ग अवसादग्रस्त होकर भी अवसादग्रस्त दिखने के लिए स्वतंत्र नहीं है। इसे बराबर यह माहौल बनाए रखना होता है कि यह बहुत ख़ुश है, संतुष्ट है और लगातार समृद्धि की ओर बढ़ता हुआ उच्च वर्ग में प्रवेश को तत्पर है। बच्चों की शादी, पढ़ाई, अपने लिए घर, ज़मीन नौकरी में प्रोविडेंट फंड और पेंशन यह सब ठीक-ठाक हो जाए तो  संसार में और धरती पर सबसे सुखी व्यक्ति माना जा सकता है। कम से कम वह तो स्वयं को मानता ही है। बड़े-बड़े सपने नहीं देखता लेकिन बड़े-बड़े सपने पर बातें करने से पीछे नहीं हटता। कहीं ना कहीं उसके अवचेतन में यह बात बैठी होती है कि बड़ा सोचने से ही बड़ा बनते हैं। यह अलग बात है कि बड़ा होने की ललक कभी-कभी उसे आजीवन त्रिशंकु बनाए रखती है।
लग्ज़री के नाम पर दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ पारिवारिक समारोह, बच्चों के साथ महीने में दो एक बार मॉल में जाकर फिल्में देख लेना, रेस्टोरेंट में जाकर खाना खा लेना और साल भर में एकाध बार कहीं बाहर वेकेशंस प्लान कर लेना इनकी ज़रूरतों में शामिल होता है।

बेशक यह तबका 'रोज़ कमाना-रोज़ खाना' के त्रासद घेरे से बाहर होता है लेकिन यह भी सच है कि इनकी जमापूंजी एक या ज़्यादा से ज़्यादा दो  महीने तक इन्हें निश्चिंत रख सकती है। यह अरसा बीतते-बीतते इसके चेहरे पर भी भावी भूख और आगत आपदाओं का भय पसारने लगता है।

कोविड-19 के इस आपातकाल में जहाँ मानव जाति के सामने अब तक के सबसे भयभीत और व्यथित करने वाले दृश्य उपस्थित  हो रहे हैं ऐसे में इस मध्यमवर्गीय प्रजाति (?) की चिंताएं स्वतः ही non essentials की श्रेणी में डाल दी गई है। फिर भी यह सच तो अपनी जगह मौजूद है ही कि एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के भी अपने दुख हैं। अपना डर, अपनी आशंका, अपने दुःस्वप्न हैं और सच मानिए यह सब उससे कहीं ज्यादा बड़े हैं जितना सोचा जा सकता है।

इस आपातकाल में अपने इन तमाम डरों और दुःस्वप्नों से दूर भागने और कबूतर की तरह आँख बंद करके इनसे निष्प्रभावी दिखने का प्रयास करते मध्यमवर्ग ने ख़ुद को अवसाद से दूर रखने के लिए कुछ रास्ते ईजाद किये। जैसे अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाकर फ़ेसबुक पर डालना, कविताएं लिखना, गीत गाना, अच्छी-अच्छी बातें करना, जिससे यह बताया जा सके कि वह बहुत निश्चिंत और ख़ुश है। अपनेआप में मगन। उसे कोई भी अवसाद छू नहीं गया है लेकिन इस बात के लिए उनकी ख़ासी आलोचना की गई। यहाँ तक कि अब यह सब करने के लिए मध्यमवर्ग ख़ुद को अपराधी मान रहा है।
जबकि सच यह है कि यह थोड़ा आत्मकेंद्रित तो कहा जा सकता है लेकिन अपराधी नहीं, और आत्मकेंद्रित तो यह वर्ग हमेशा से था। कोई और विकल्प भी नहीं है इसके सामने। सामाजिक और आर्थिक रूप से मध्यमवर्ग के पास ऐसी कोई ताकत नहीं होती जिससे वह परिस्थितियों को आमूलचूल बदल देने का साहस कर सके। ऐसे में मध्यमवर्गीय लोग अपना-अपना देखने में ही विश्वास रखते हैं। अब भी वह ऐसा कर रहे हैं। यह अपराध नहीं है। हर किसी को अपने अवसाद से लड़ने का अधिकार है। तरीक़ा अलग हो सकता है। यह उनके लड़ने का तरीक़ा है। इसे बुरा नहीं कह सकते।

कोविड-19 के आफ्टर इफेक्ट में इसके दुष्प्रभाव का एक बड़ा हिस्सा इसी वर्ग को झेलना होगा। उनके सामने एक ऐसी लंबी लड़ाई है जिसमें खुलकर उतरने की तैयारी भी उन्होंने कभी नहीं की।

मेरे एक मित्र ने (जिनका अच्छा ख़ासा चल रहा निजी व्यवसाय कोविड-19 के चलते तबाह होने के कगार पर है) ने अपना डर मुझसे यह कहते हुए साझा किया था कि 'हम तो किसी से मुफ़्त का राशन भी नहीं माँग पाएंगे क्योंकि सामने वाला कहेगा कि आपके घर में तो कार है। जबकि वह कार EMI से ली गई है।'

आज जब देश तकरीबन 2 महीने की पूर्ण बंदी यानी लॉक डाउन के भयावह यथार्थ से जूझते हुए इतिहास के अब तक के सबसे विवश समय का साक्षी होने को बाध्य है। लाखों की संख्या में पैदल ही देश का ओर-छोर नापते, भूख-प्यास से बिलबिला कर दम तोड़ते, ट्रेन की पटरी पर कट कर मरते या बस और ट्रक से कुचलकर मारे जाते गरीबों-मजदूरों द्वारा अपने ही देश में किए जा रहे महापलायन को देखने पर मजबूर है।
ऐसे में मध्यमवर्ग अपनेआप को अवसाद के ब्लैक होल में समाने से रोकने का भरपूर प्रयास कर रहा है क्योंकि उसे मालूम है कि जो कुछ भी हो रहा है, उसका दृष्टा बने रहने के अलावा उसके सामने फिलहाल कोई दूसरा चारा नहीं है। जिसे योगदान या प्रयास कहा जा सकता है, अपनी तनख्वाह का कुछ अंश दान कर या फिर अपने आसपास के कुछ भूखे लोगों को भोजन करवाकर, वह अपने हिस्से का यह योगदान कर चुका है। इससे ज़्यादा वो क्या करे, यह सोच पाना फिलहाल उसकी सामर्थ्य के बाहर है। ऐसे में बस एक ही काम है  जिसे  करने से आशा की कुछ उम्मीद बनती है और वह है अपने आप को मजबूत और सकारात्मक रखना ताकि आगत परिस्थितियों का सही मनोदशा के साथ सामना किया जा सके।
जब उसकी ऐसी कोशिशों को लक्ष्य किया जाता है तो वह ख़ुद भी अपराध बोध से घिर जाता है -
अपनी नज़रों में गुनाहगार ना होते क्योंकर,
दिल ही दुश्मन है मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह।

हालांकि मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई भी कोशिश ग़लत कहीं जाने चाहिए। अवसाद को अगर आना ही है तो वो दबे पाँव आएगा ही लेकिन जितनी देर उसे टाला जा सके डाला जाना ही चाहिए। ख़ुद को ख़ुशी का दिलासा देते हुए मुसीबत का समय बीत जाए तो इसमें क्या बुरा है ?

- एक प्रतिनिधि (मध्यमवर्गीय-आम जनता)

मंगलवार, 12 मई 2020

बदल जायेगा बहुत कुछ !


जाने-माने पत्रकार और फ़िल्म समीक्षक श्री Ajay Brahmatmaj जी ने अपने यू ट्यूब चैनल 'सिने-माहौल' में वर्तमान परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए एक बहुत अहम प्रश्न उठाया गया है।
'क्या किस्सों तक ही रह जाएंगे सिनेमाघर ?'
कला, संस्कृति, रंगमंच तथा फिल्मों से जुड़े हुए लोगों के लिए यह प्रश्न दरअसल सिर्फ प्रश्न नहीं आगत भविष्य की आहट भी है। इस प्रश्न में भविष्य के प्रति डर है तो उस डर का सामना करने की तैयारियों का बिगुल भी है। जैसा कि अजय सर ने इस वीडियो में कहा भी है, रंगमंच और सिनेमा अगर एक सामूहिक कला है तो अब तक इसका आनंद लेना भी एक सामूहिक क्रिया ही थी। एक साथ हॉल में फिल्म देखने का जो मज़ा हुआ करता था उसका कोई जोड़ नहीं हो सकता लेकिन अब 'समय' हमें उस आनन्द से कुछ दिनों तक वंचित रखने वाला है। कोरोनावायरस संकट के बादलों से घिरे हुए समय में लॉकडाउन खत्म होने के बाद हमारी जीवनचर्या अब लम्बे समय तक नॉर्मल होने वाली नहीं है। बदलेगा, बहुत कुछ बदलेगा। हम चाहें या न चाहें। हम बदलाव को अपनाने में चाहे कितनी भी देर लगाएं लेकिन यह बदलाव हमारे जीवन का अनिवार्य और अस्थाई अंग बनेगा ही बनेगा।
जीवन और इसकी परिस्थितियों का मार्च 2020 से पहले के स्वरूप में लौट पाना थोड़ा मुश्किल है और यह ज़रूरी भी है।
जैसा कि जानकार लोग कह रहे हैं कि कोरोनावायरस कोई पहला और आखिरी वायरस नहीं है जिससे लड़ने के लिए हमें एक बहुत बड़ी रणनीति बनाने की आवश्यकता पड़ रही है। दरअसल पिछले कई दशकों से हमने जिस तरह से प्रकृति का दोहन किया उसके परिणाम स्वरूप अभी बहुत सारे प्राकृतिक विषाणु हमसे प्रतिशोध लेने के लिए आने वाले हैं। विशेषरूप से यह वायरस अगर सच में, जैसा कि संदेह किया जा रहा है, मानव निर्मित है तो यह 'सच' भविष्य में और बड़े खतरे का संकेत मात्र है।
अर्थव्यवस्था और सामरिक शक्ति के क्षेत्र में सबसे ताकतवर होने की भूख मानव से अभी और अनिष्ट करवाएगी। ऐसे में हमारे पास अपनी जीवनचर्या को बदलने और अपने आसपास अपना निजी सुरक्षा चक्र स्वयं निर्मित करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं होगा और इस प्रक्रिया के अंतर्गत जो चीज सबसे पहले छोड़ी जाएगी, वह है अनजान और अनावश्यक भीड़ में हमारा मौजूद होना।

मेलों, बाजारों, नाटक और सिनेमा देखने के लिए थियेटरों, यात्राओं के दौरान स्टेशनों और हवाई अड्डों में जब भी हम रहे, कभी यह ध्यान नहीं दिया कि हमारे आसपास कौन है ? कौन बैठा है ? कौन हमसे स्पर्श हो रहा है ? हम किसे स्पर्श कर रहे हैं ? हमसे कितनी दूर बैठकर कौन खांस रहा है ? किस को बुखार है ? बल्कि कोई बीमार दिखा तो उसकी मदद करने में तत्पर होना अपना कर्तव्य लगा। मगर अब यह सब बदल जाएगा। हम बदल जाएंगे। कब तक के लिए पता नहीं लेकिन फ़िलहाल तो ज़रूर और यहीं शायद हमारे हक़ में भी होगा। दूसरों की मदद के काबिल भी हम तभी हो पाएंगे जब हम खुद मजबूत और सेहतमंद होंगे। हमें अपना इम्यून सिस्टम मज़बूत करना होगा और उन सारे हालात से जितना हो सके दूर रहना होगा जो हमें किसी भी तरह के संक्रमण से ग्रस्त कर सकें।
यात्राएं कुछ हद तक बची रहेंगी लेकिन बाज़ार, सांस्कृतिक आयोजनों, मेलों और थियेटरों की रौनक कम हो जाएगी। अरबों-खरबों रुपए कमा कर देश की अर्थव्यवस्था में योगदान करने वाली हमारी फिल्में अब एक नए समय का सामना करने के लिए तैयार होंगी जहाँ पर उन्हें दर्शकों को पहले से ध्यान में रखना होगा। सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स पर टूट पड़ने वाली भीड़ कुछ समय तक गायब रहेगी और इसका पूरा असर नाटकों पर भी पड़ने की संभावना है। थिएटर में दर्शकों का आना संशय में है। ऐसे में नई संभावनाएं तलाशना हमारे लिए चुनौती, आवश्यकता और मजबूरी तीनों एक साथ बन गया है।
फ़िलहाल डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ी सक्रियता ने हमें संतोष दिलाया है कि सब कुछ ख़त्म नहीं होगा सिर्फ अपना तरीक़ा बदलेगा लेकिन यह भी सच है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की भी अपनी सीमाएं हैं। उनमें से कुछ प्रस्तुतियों से जुडी हुई हैं और कुछ का संबंध इंटरनेट पर लगातार बढ़ रहे दबाव से जन्मी परिस्थितियों से भी है। नेटवर्क पर अचानक जितनी भीड़ लगी है उसके भी अपने कुछ प्रभाव होंगे ही। अभी तो हमें उसके लिए भी तैयार होना है।
हाँ अभी बहुत सारी तैयारियां करनी हैं और उसके लिए बस तीन चीज़ों की आवश्यकता है - धैर्य, आशा और सकारात्मकता।

अजय ब्रह्मात्मज सर के चैनल 'सिने-माहौल' का लिंक यह रहा......

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...