शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

ज़िंदगी का एक सफहा और पलट गया . देखते ही देखते एक और साल पुराना हो गया . अतीत का हिस्सा बन गया . पता नहीं क्यों मन उदास सा है . जो बीता मन की पसंदगी में तो शामिल नहीं था , उसने जाते हुए कुछ कभी न भूलने वाले ज़ख्म भी दिए , आखों को अश्कबार किया , कुछ बहुत गहरे विश्वास हिलाए , कुछ बहुत कड़वी यादें दीं  , फिर भी इसे विदा कर के मन उदास है . शायद जाते के लिए उदास होना मन की फितरत है .......
मगर मैं इस लम्हे में इस उदासी को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहती . जाते हुए लम्हों को जाते देखने के साथ आते हुए वक्त का इस्तकबाल भी तो करना है. गए हुए के किये कि सज़ा आने वाले को नहीं दी जा सकती . आखिर  अभी तो उसने अपने दामन में हमारे लिए उम्मीद के नायाब मोती भर  कर रखें ही है न ..........! 
... तो आगत का हार्दिक स्वागत करते हुए मेरे सभी अपनों , स्नेही जन , स्वजन , आत्मीय और मित्रों को नव वर्ष की असीम शुभ - कामनाएं !!!
बीते साल का आखरी हिस्सा बेहद मसरूफियत भरा रहा . ये मसरूफियत यूं तो मन को बहुत भाती है क्यों कि इसमें रोज़ के लिए एक नया मकसद छुपा होता है , लेकिन बुरा बस ये लगा कि इस अरसे में मुझे अपने अपनों से न चाहते हुए भी दूर रहना पड़ा , नेट पर भी बहुत कम बैठ पाई . नये साल में फिर नयी उम्मीद के साथ अपने अपनों से जुड कर नया आकाश सिरजना है ....
सो फिर से नयी उम्मीद भरी शुभ - कामनाओं के साथ 

हर्ष नव 
वर्ष नव 
जीवन उत्कर्ष नव  !कर रखें

शनिवार, 11 दिसंबर 2010



जी हाँ ! एक लम्बे अरसे बाद ये पोस्ट सिर्फ इस सनद के लिए .... कि मैं ज़िंदा हूँ अभी. एक बेहद थकाऊ और व्यस्त दिनचर्या से भरा पिछला लगभग एक महीना गुज़रने को है . मुझे खुद से भी मिलने की फुर्सत नहीं मिली . इस दौरान किसी भी ज़रिये अपने लोगों से न जुड पाने का अफ़सोस भी साथ लगा रहा . हांलाकि जो दिल के बहुत  करीब हैं वो खुद अपनी कोशिशों से आस- पास बने रहे . लेकिन जिन तक पहुँचने के रास्ते भी मुझे ही बनाने होते हैं वो कुछ पीछे छूट गए से महसूस हुए . इस बीच बहुत कुछ गुज़रा . सच कहूं तो अच्छा कम ........., बुरा ज़्यादा ! मेरे प्यारे शहर को एक बार फिर दहशतगर्दों ने चोट पहुंचाई  .कुछ बहुत ख़ास एहसास मन में उठे और बिना कोई आकार लिए धुंधला गए . मेरी व्यस्तता के चलते बहुत सारी चीज़ें आगे के लिए मुल्तवी हो गयीं , जिन्हें मैं अभी ही करना चाहती थी. अब कुछ खाली हुई हूँ तो पता चला कि नेट महोदय ने भी नववर्ष के स्वागत के उत्साह में छुट्टी ले रखी है उफ़ ये रोना ........ और इससे बढ़ कर इस बात का रोना कि गया वक्त लौट कर नहीं आता तो बीते को बिसरा कर आगे देखना ही समझदारी है. सो इस वक्त किसी और की मेहरबानी से नेट पर बैठी मै उम्मीद लगाए हूँ कि ये लंबा अंतराल जल्द ही भर सकूंगी मै. .... और हाँ एक बार फिर ये सनद कि .........मैं ज़िंदा हूँ अभी ! बस थोड़ी खामोशी है जिसने घेर लिया है मुझे , उम्मीद है ये भी टूट जायेगी जल्दी ही ... इंशा अल्लाह !!!!!!! .

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

मन खामोश है , कहीं कोई आवाज़ नहीं ... फिर भी कुछ है जो बयाँ होना चाहता है-



शनिवार, 6 नवंबर 2010


 ऐ हादसे, 
सोचा तो था कि तुम्हें बयाँ करना है लफ़्ज़ ब लफ़्ज़........,  
बिखेर देनी हैं अपने अल्फ़ाज़ के ज़रिये तुम्हारी धज्जियाँ , ठीक वैसे ही, जैसे तुमने अपने अचानक आघात से बिखेर दिया है बहुत कुछ......., सराबोर कर डालना है तुम्हें उसी सियाही से, जिससे तुमने एकाएक ही बिगाड डाले हैं जाने कितने रंग.......,
डुबो देना है तुम्हें भी आँसुओं के उसी सैलाब में, जो तुमने बिना किसी संवेदना के ला दिया है कई ज़िन्दगियों में....., 
सोचा तो था कि कोसना है तुम्हें जी भर...., 
धिक्कारना है तुम्हें सामर्थ्य भर...., 
नेस्तनाबूद कर डालना है तुम्हारे हो जाने की सच्चाई को....,
मिटा डालनी हैं वो सारी तहरीरें,जो चीख-चीख कर दे रही हैं खबर तुम्हारे घट चुकने की.... ,
सोचा तो बहुत था कि लेकर अपनी मूक अभिव्यक्ति का सहारा, उँडेल दूँगी अपने भीतर अनायास ही भर गये दुख को खुद से कहीं दूर.......,
पा जाउँगी निजात उस अवसाद से जो अपने ही में अचानक सिमटा चला आ रहा है मेरे आस-पास ....,
कि अपनी अभिव्यक्ति की ताकत पर बहुत नाज़ था मुझे....,
लेकिन अब जब लिखने बैठी हूँ तो जाना है कि ......,
नहीं......., कुछ भी नहीं लिख सकूँगी मैं ...! 
भावों ने मान ली है हार..., शब्दों ने खडे कर दिये हैं हाथ.......,
और सारे अर्थ..., वो तो मानों कहीं जा दुबके हैं, कहीं दूर किसी अँधेरे कोने में अपना मुँह छिपाए........, 
और मानना ही पड रहा है मुझे कि नहीं.., कुछ नहीं लिख पाउँगी मैं....., 
नही बदल पाउँगी तुम्हारे घट जाने को...., 
अब रहना ही होगा हमें - हम सबको इस क्रूर सच्चाई के साथ कि तुम घट ही गये हो असमय, अचानक,अप्रत्याशित....,
और हतप्रभ हूँ मैं
क्योंकि ये जानना भी तुमसे कम हादसा नहीं 
कि कुछ हादसों की शिद्दत हर अभिव्यक्ति से गहरी होती है 
और कुछ ज़ख्म किसी भी सूरत कभी भरे नहीं जा सकते...!

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

दीये की आदत...

दीये की कुछ आदत ही ऐसी है कि वो खुशियाँ अकेले नहीं मनाता..., जलता है तो उजियार का उपहार सबको बाँटता ज़रूर है. कम हो या ज़्यादा... प्रकाशित होने का सुख सबसे साझा करता है. एक हो या अनेक, दीये की उपस्थिति को नकारना संभव नहीं, क्योंकि दीया अपने होने को किसी से छिपा कर नहीं रखता, न ही अपने आलोक का धन अपनी ही मुठ्ठी में दबा कर रखता है. इसीलिये तो सूर्य की निर्विवाद और निरंतर उपस्थिति के बावजूद दीये की महत्ता आज भी अपनी जगह अटल स्थापित है.
इसी नन्हे, क्षणभंगुर, नश्वर, परन्तु एक सतत, शाश्वत, अनश्वर प्रकाश को अपने भीतर समाए, हमें हर तिमिर से लडने की शक्ति और विश्वास देते  दीये के प्रति आभार प्रकट करने का पर्व है दीपावली. आकाश में सूरज-चाँद-सितारों और ज़मीन पर बनावटी-नकली रोशनी बिखेरती बिजली की लडियों के बावजूद अपनी सादगी, सौम्यता और सात्विकता से सत से असत एवं तम से ज्योति की ओर जाने का संदेश देते दीये से कुछ सीखने का पर्व है दीपावली.
मेरे सभी अपनों को इस शुभ प्रकाश पर्व की असीम शुभ कामनाएं !!!


शुभ दीपावली

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

विसर्जन, प्रतिमा का...!

नमस्तस्यै... नमस्तस्यै...नमस्तस्यै...नमो नम: !!

मन अजीब सा हो रहा है पिछले कुछ दिन से .बहुत चाह कर भी कुछ  लिखने की इच्छा नहीं हुई.पिछले दिनों मेरा सारा शहर माँ मय हो गया था. बाबा भोले नाथ की नगरी में जित देखो , तित माँ के जयकारों की गूँज थी और ये हर संदर्भ में परम स्वभाविक स्थिति है क्योंकि स्वयं भोलेनाथ भी बिना शक्ति के शिव नहीं शव हैं तो शिव की नगरी में शक्ति के जयकारे पर अचरज कैसा ? 
सबने शुभ नवरात्रि का पर्व पूरी आस्था, भक्ति और विश्वास के साथ मनाया. इस पर्व का संदर्भ लेकर बनारस को मिनी बंगाल यूँ ही नहीं कहा जाता. जिसने भी काशी की दुर्गापूजा देखी है वो इसकी भव्यता से इन्कार  कर ही नहीं सकता.हम भी अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच समय निकाल कर पूजापंडालों में गये और माँ के भव्य-दिव्य स्वरूप का दर्शन किया.
 नवरातों में काशी के पूजा पंडाल देखने और देवीदर्शन करने का अर्थ है लगभग सारा शहर पैदल घूमना. ट्रैफ़िक व्यवस्था बनाये रखने और दर्शनार्थियों की सुविधा को देखते हुए तमाम रास्ते वनवे कर दिये जाते हैं और यातायात साधनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है.मगर माँ के बच्चे सारी बाधाओं और परेशानियों को अपने ढेंगे पर रखते हुए सारी-सारी रात दर्शन कर निहाल होते रहते हैं.जैसा कि हर पर्व-उत्सव के साथ हमारी कोई न कोई आस्था या मान्यता जुडी होती है, नवरात्रि के साथ भी हमारी एक बेहद संवेदनात्मक आस्था जुडी है कि माँ इन दिनों अपने ससुराल से पीहर लौटती हैं और हमारे साथ पर्व मना कर दशमी के दिन वापस चली जाती हैं.एक बेहद भावुक विश्वास , जो मन को हर बार कहीं गहरे से छूता और विचलित कर जाता है. बेटी की विदा या माँ का जाना दोनो ही भाव मन को भिगो-भिगो देने वाले हैं. शायद यही वजह है कि हर बार देवीप्रतिमा विसर्जन के बाद एक भारीपन सा दिमाग पर छा जाता है. एक हफ़्ते की रौनक के बाद खाली और सूने पडे पूजापंडाल उदास कर जाते हैं और उदासी का सबसे गहन क्षण होता है माँ की प्रतिमा का विसर्जन .
दशमी रविवार को थी, इस दिन मान्यतानुसार बेटी विदा नहीं की जाती तो अधिकतर प्रतिमाएं सोमवार को विसर्जित की गयी.आफ़िस से लौट रही थी तो स्वभाविक रूप से जाम मिला. पुलिस-प्रशासन की मुस्तैद निगरानी के बीच कानफ़ोडू डीजे और नगाडों  पर बदहवास झूमते नाचते विसर्जन करने जा रहे   माँ के भक्तों को देख कर मन हमेशा की तरह विरक्त भाव से भर गया . माँ को विदा करने के क्षण में ये उल्लास कैसा...? 

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

युनुस भाई के बहाने...!

ये बात तो आप भी मानेंगे कि दुनिया में जो कुछ होता है उसके पीछे कोई न कोई वजह ज़रूर होती है. हर होनी का कोई न कोई बहाना ज़रूर बन जाता है.अब अगर ये सच है तो बिलाशक मेरे आकाश के इस सफ़हे पर उतरने वाले अल्फ़ाज़ की वजह हैं युनुस भाई. 
युनुस भाई बोले तो, युनुस खान... विविध भारती मुंबई की वो हरदिलअज़ीज़ आवाज़, जिसके तार्रुफ़ के लिये मेरे लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं. एक दफ़ा अपनी जम्मू-कश्मीर यात्रा के दौरान जब मैंने गुलमर्ग की ऊँचाइयों पर विविध भारती सुनते हुए लोगो को देखा  था तो तहेदिल से महसूस और स्वीकार किया था कि जो चीज़ें हिन्दुस्तान को एक छोर से दूसरे छोर तक जोडे रखतीं हैं, विविध भारती उनमें से ही एक है तो इस लिहाज़ से युनुस खान को भी किसी तार्रुफ़ की ज़रूरत नहीं. 
तो बिना कुछ और कहे सीधे अपनी बात पर आती हूँ.
युनुस भाई की मेहरबानी से एक बेहद कीमती, नायाब और अपने दिल के  बहुत करीब रहने वाले एहसास से एक नये अंदाज़ में रूबरू हुई हूँ मैं. 
उनकी मेहरबानी ये कि उन्होंने अपने ब्लोग और लिंक्स के ज़रिये ये बेशकीमती चीज़ अपने चाहने वालों और अपने दोस्तो से बाँटी है और वो चीज़ है - गुलज़ार साहेब की रूहानी शायरी से सजा बेहद खूबसूरत               " गुलज़ार कैलेन्डर "
कैलेन्डर है तो ज़ाहिर है तारीखें भी हैं जो साल के साथ बदल जायेंगी, पुरानी हो जायेंगी.लेकिन इस कैलेन्डर पर सजे अल्फ़ाज़ का नशा पुरानी शराब सा बढता ही जाना है इसमें कोई शक नहीं. 
इसको देखा तो जाने कब से बंद मन के दरीचे जाने कैसे खुदबखुद खुल गये और उनसे भीतर आकर यादों की खुश्बू ने मानों मेरे सारे वजूद को खुद में समेट लिया. मेरे तसव्वुरात मुझे हाथ पकड कर वहाँ ले गये, जहाँ से गुज़र चुके एक अरसा हुआ... मगर लगता है जैसे अभी कल... नहीं, बस कुछ पल पहले की बात है.......
क्या वक्त था, जब हम गुलज़ार को पढते नहीं, जिया करते थे, उनके अल्फ़ाज़ को पिया करते थे. १९९७ से २००१ तक का वो दौर जब आकाशवाणी वाराणसी में हम कुछ दोस्तो का वो अंतरंग सा दायरा, जिसका मर्कज़ थे गुलज़ार..., अपने अल्फ़ाज़ की शक्ल में. 
तब ज़िंदगी को समझने का हमारा सीधा फ़लसफ़ा हुआ करता था गुलज़ार समझना. यानी " जिन लाहौर नही वेख्या........" की तर्ज़ पर जिसने गुलज़ार को नही समझा उसने कुछ नही समझा...और गुलज़ार को समझना कोई हँसी-खेल तो था नहीं. अल्फ़ाज़ का ये जादूगर कब-कहाँ-किस तिलस्म में बाँध दे, क्या पता. सबकी कोशिश रहती कि बस उस हर तिलस्म की तह तक पहुँचा जा सके क्योंकि उसे तोडना कोई नहीं चाहता था.
मैं इस मामले में उन खुशनसीब लोगो में थी जिन्हें गुलज़ार को समझने के लिये कभी किसी ज़ेहनी मशक्कत से नहीं गुज़रना पडा. उनकी कलम से निकला हर लफ़्ज़ सीधे मेरे दिल तक यूँ पहुँचता रहा है मानों अपना ठिकाना खोज रहा हो. कई दफ़ा सिर्फ़ ये सोच कर रोई हूँ मैं कि आखिर इस शाएर ने मेरे मन को , मेरे दर्द को अपने लफ़्ज़ में कैसे लिख डाला ? हाँ... उस आसमान के सामने खुद के एक ज़र्रे से भी कमतर होने की हकीकत को स्वीकारते हुए भी अनगिनत बार मैंने अपने मन को उनके लफ़्ज़ में साँस लेते महसूसने की गुस्ताखी की है.  
मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पडा है.....ये नज़्म जब सुनी है, जैसे सारा जिस्म ही कानों में तब्दील हो गया है कि कहीं कोई एहसास छूट न जाए सुनने से.
गुलज़ार की सिर्फ़ रूमानी और रूहानी शायरी से ही इश्क नहीं किया हमने बल्कि उनके उस मासूम दुलार ने भी हमें कई बार रुलाया है जिस पर उनकी प्यारी बिटिया बोस्की (मेघना गुलज़ार) का एकाधिकार है   
" बिट्टू रानी बोस्की-बूँद गिरी है ओस की..."  
और एक स्वीकारोक्ति ये कि हर दफ़ा इन लाइनों ने बेवजह ही बोस्की से ईर्ष्या करने पर मजबूर सा किया है .
क्या दिन थे....! गुलज़ार साहब का शाहकार मरासिम हमारे जीने की वजह बन गया था.
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोडा करते...,
वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोडा करते...! 


शाम से आँख में नमी सी है.
आज फिर आपकी कमी सी है.
वक्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
इसकी आदत भी आदमी सी है.



सीने में जल रहा है क्यों बुझता नहीं धुँआ.
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुँआ.
आँखो से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं,
मेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुँआ.



 मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे...!

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

मैं और ताजमहल...

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बीते रविवार मैं ताजमहल के साथ थी. सच..., वहाँ पहुँच कर किसी के साथ होने का सा ही एहसास होता है.तेज़-तीखी धूप के बावजूद ताज के सामने मौजूद होने की अनुभूति किसी ठंडक भरी राहत से कम नहीं थी. ये पहली बार नही था कि मैं वहाँ थी पहले भी कई दफ़ा दुनिया की इस नायाब खूबसूरती को बहुत करीब से देखने और महसूस करने का मौका मिला है. हर बार लगा है कि इसे तो बार-बार देखा जाय तो कम है और हर बार जब-जब ताज के सामने पहुँची हूँ , जेहन में गूँजता ये शे’र बेसाख्ता ज़ुबाँ पर आ गया है-



एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल; 
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है.

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

ये समय खुद को बधाई देने का है.

बात का संदर्भ निश्चित रूप से राष्ट्रीय है लेकिन इस वक्त मन सिर्फ़ अपने शहर के बारे में बात करने का हो रहा है और स्पष्ट कर दूँ कि इसके पीछे वजह , विचारों का संकुचन नहीं , बल्कि भावों की गहनता है. कल यानी तीस सितम्बर की तारीख हमारे इम्तहान का क्षण था .न सिर्फ़ एक व्यक्ति बल्कि एक लोकतन्त्र के रूप में भी हमारे कसौटी पर कसे जाने का दिन था कल. बीस साल पहले और उससे भी आगे साठ साल पहले की तल्ख यादों और कटु अनुभवों ने मन को न चाहते हुए भी कमज़ोर सा बना रखा था.
कुछ भी नहीं होगा के विश्वास को अगर कुछ हो गया तो... की आशंका का दंश लाख कोशिशों के बाद भी डस रहा था. सबकी तरह हम भी शाम ढलने के पहले घर पहुँच जाने को उत्सुक थे. मन में अपने लिये भय नही,हाँ जल्दी वापस लौट कर घर वालों को आश्वस्त करने का भाव ज़रूर था. ये बात और कि फ़ैसला क्या और किसके पक्ष में ? जैसे सवाल सोच के दायरे से भी कोसों दूर ही थे. इच्छा थी तो इतनी कि जो भी हो , सब सकुशल निकल जाए. फिर शाम हुई, देश का बहुप्रतीक्षित फ़ैसला आया और सब कुछ कुशलता से बीत गया.शाम के गहराने के साथ ही शहर बनारस की विश्व प्रसिद्ध अलमस्ती सडकों को गुलज़ार कर गयी. सारी आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए काशी की गंगा-जमनी तहज़ीब ने एक बार फिर अपना परचम लहरा दिया.
हम तहेदिल से शुक्रगुज़ार हैं अपने शहर के लोगों के,मीडिया के और प्रशासन के जिन्होंने मिल कर-हाथ से हाथ मिला कर न सिर्फ़ इस इम्तहान का सामना किया बल्कि अव्वल भी आये.
एक बार फिर जीती इन्सानियत,
एक बार फिर जीता बनारस !
होठों पर फिर आया एक शेर...

कभी तो यूँ हो कि दोनों का काम चलता रहे,
हवा भी चलती रहे और दिया भी जलता रहे !

शनिवार, 18 सितंबर 2010

तस्वीरों में कैद खूबसूरत यादें....!

कहते हैं, वक्त गुज़र जाता है, यादें रह जाती हैं. वो रह ही नहीं जातीं , बल्कि मन के एक कोने में हमेशा-हमेशा के लिये अपना घर भी बना लेती हैं.याद बुरी हो तो ज़िन्दगी भर की तकलीफ़ बन कर रह जाती है और अच्छी  हो तो तकलीफ़ में मरहम बन कर सुकून देती है,लेकिन याद रहती ज़रूर है.मेरे ज़ेहन में भी अनगिनत यादों का अम्बार है. अच्छी भी , कुछ बुरी भी... ! लेकिन कुछ यादें हैं जो इन दोनों परिभाषाओं से अलग..., अपना वजूद बनाये हुए हैं. वो यादें, जो मुझे ज़िन्दा रखती हैं ,मुझे मेरे जीने का मकसद और मायने देती हैं, तमाम परेशानियों में भी मुझमें ये यकीन जगाये रखती हैं कि ये दुनिया बेहद अच्छी है, जीने-देखने-महसूस करने के काबिल है और ऐसा मुझे शिद्दत से महसूस होता है, जब मैं कुदरत के करीब होती हूँ. बीती जुलाई में उत्तर भारत भ्रमण के दौरान कुदरत के करीब होने का मौका मिला तो इन यादों का खज़ाना कुछ और भर गया. सोचा था, लौट कर हर एक क्षण को ब्लोग में ज़रूर सहेज लूँगी लेकिन ऐसा कर न सकी.मगर आज फिर मन में ये ख्याल एक अधूरी ख्वाहिश सा कौंधा तो सोचा,क्यों न उन यादों के रंग में रंगी तस्वीरों को ही बाँट लूँ अपनों के साथ... और इसी बहाने मैं भी जी लूँ , फिर से वो सारे पल ................!
मैं... मनाली में....
वशिष्ठ मंदिर - मनाली

हुस्न पहाडों का...

क्या कहना , कि बारहों महीने....
यहाँ मौसम जाडों का... !
यकीन नहीं होता, जो जगह मेरे ख्वाबों में थी , वो अब इतने पास....
ख्वाब जैसा सच... , सचमुच !!

ये हसीं वादियाँ......

ये खुला आसमाँ.....

यकीं नहीं होता , हम हैं वाकई यहाँ...

मनाली में व्यास नदी के किनारे...

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

मर्चेंट आफ़ दी वेनिस...!



 



 नही... ,नही..., आप धोखे में बिल्कुल मत आइयेगा . ये शेक्सपियर के मर्चेंट आफ़ दी वेनिस की झलक नही , हमारे शहर की एक व्यस्ततम सडक का नज़ारा है. अब कि सावन हमारे शहर में ज़रा झूम के आया और भादो ने भी कारे-कजरारे मेघों की अगवानी में बाहें पसार दी तो फिर क्या..., जित देखो, उत जल ही जल...! आनंद तो खूब आया लेकिन बकौल जनाब जावेद अख्तर साहेब -  दुनिया में हर शै की कीमत होती है तो हमने भी आनंद की कीमत चुकायी, जगह-जगह जल-जमाव झेल कर ! अब इन बेचारों की हालत पर गौर कीजिये - बिना कश्मीर गये डल झील के बीच बैठे हैं ग्राहकों के इंतज़ार में , ग्राहक कोई नाव मिले, तब तो पार करें ये वैतरणी...! वेनिस या डल झील में तो लोगों को ये सुविधा मिलती ही है न , फिर हमें क्यों नही.....,  किससे कहें ?  लगता है अब आसमान से ही पानी के साथ ही नाव या लाइफ़ बोट बरसे , तब कहीं जा कर इस मुसीबत से राहत हो ..., आपका क्या ख्याल है ? 

सोमवार, 13 सितंबर 2010

जुगलकिशोर जी के साथ साक्षात्कार के अंश...

आमिर खान प्रोडक्शन की फ़िल्म पीपली लाइव में मुख्यमंत्री की भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ कलाकार जुगल किशोर जी से मुलाकात का अवसर मिला. इस पोस्ट में इसी मुलाकात में की गयी कुछ बातों को शब्दों में बाँध कर प्रस्तुत कर रही हूँ-

हिन्दी बेल्ट में रंगमंच की स्थिति पर आपका क्या सोचना है ? हिन्दी रंगमंच को आज कहाँ पाते हैं आप ?

हिन्दी रंगमंच की स्थिति आज निश्चित रूप से संतोषजनक नहीं कही जा सकती है.वो गुणवत्ता अब नही रही जो पहले हुआ करती थी.हाँलाकि रंगमंच के लिये सुविधाएं ज़्यादा हो गयी हैं फिर भी वो क्वालिटी अब देखने को नहीं मिलती. वजह ये है कि हिन्दी रंगमंच अब भी प्रोफ़ेशनल का दर्जा हासिल नही कर पाया है. पैसे और शोहरत के लिये अच्छे कलाकार टीवी या फ़िल्म की ओर रूख कर लेते हैं .बिना किसी लाभ या पैसे के थियेटर करने वाले दीवाने कम ही मिलेगे और अगर मिलें भी तो क्वालिटेटिव वर्क ही उनकी प्राथमिकता होगी, जो कम हो चुका है 

आप रंगमंच का जाना-माना नाम हैं. आपकी फ़िल्म पीपली लाइव भी इस समय विश्वस्तर पर चर्चा में है.एक धारणा ये बनी हुई है कि अगर रंगमंच के कलाकार सिनेमा की ओर रूख करते हैं तो ये उनमें रंगमंचीय समर्पण में  कमी का द्योतक है. दोनों माध्यम को जीने के बाद आपका इस धारणा में कितना विश्वास है ?

बिलकुल नहीं !  रंगमंच और सिनेमा दो अलग स्तर की अभिव्यक्तियाँ  हैं जिनमें तुलना व्यर्थ है . एक अच्छा  और अच्छे काम के लिये उत्सुक कलाकार इन दोनो ही माध्यमों से खुद को व्यक्त करना चाहेगा और उसे ऐसा करना भी चाहिये. नाटक और सिनेमा में एक सबसे बडा अंतर है पहुँच का. मैं इस वक्त यहाँ बैठा आपसे बातें कर रहा हूँ और इसी वक्त दुनिया के तमाम थियेटर में मेरी फ़िल्म चल रही होगी और मैं एक्टिंग कर रहा हूँगा, ये है सिनेमा की रीच. नाटक एक बार हो कर खत्म हो जाता है . फिर उसकी चर्चाएं होती हैं, समीक्षाएं होती हैं, अखबार में खबर छपती है, लेकिन नाटक खत्म हो जाता है, अगले शो तक के लिये .... , लेकिन फ़िल्म चलती रहती है. आप सो रहे हों तो भी आपका काम देखा जाता है, आप न भी रहें तो आपका काम रहता है और आपको भी ज़िन्दा रखता है , तो ये पहुँच है सिनेमा की. फ़िल्म और थियेटर के बीच भेद-भाव  की बातें बेसिर-पैर की हैं . बल्कि मुझे तो लगता है कि समर्थ कलाकार को दोनो ही माध्यमों में काम ज़रूर करना चाहिये. लोगों को भी अच्छा काम देखने को मिलेगा.

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

नेमतें लाया चाँद ईद का..... !


एक महीने की इबादत ,रोज़े,नमाज़,तरावीह और जब्त के साथ बिताये गये वक्त का ईनाम मिलने ही वाला है. चाहत का जाम लेकर, दिलकश पयाम लेकर,खुशियाँ तमाम लेकर,लो ईद आ रही है...कितने खुशकिस्मत हैं हम लोग,जो हिन्दुस्तान में पैदा हुए हैं और हमें कुदरत और इंसान दोनो की बख्शीं नेमतें और खुशियाँ जीभर के जीने का मौका ऊपर वाले ने दिया है. जिस-जिस तक मेरे ये अल्फ़ाज़ पहुँचे, उन सबको मेरी और मेरे वतन की ओर से ईद की ढेरों मुबारकें...!
ईद की दुआएं, सबके लिये




सब खुश हों ,हर मुँह में सेंवई की मिठास हो, हर ज़ुबान पर अमनोअमान के लिये दुआएं हों, हर दिल में सबके लिये प्यार-दोस्ती हो, हमारे लिये तो बस यही सबसे कीमती ईद हो जायेगी.और ये एक बहुत प्यारा सा शेर ,आप सबके लिये, जो मेरे शहर और अदबोशायरी के बहुत मकबूल और हरदिलअज़ीज़  शाएर जनाब मेयार सनेही की कलम से निकला है -

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मुख्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ एक मुलाकात



बात पूरी करने पहले साफ़ कर दूँ कि मुख्य प्रदेश को भारत के नक्शे पर खोजने की कोशिश मत कीजियेगा . ये प्रदेश आपको आमिर खान प्रोडक्शन की हालिया फ़िल्म पीपली लाइव में मिलेगा और अगर आपने ये फ़िल्म देखी है तो निश्चित रूप से आपको मुख्यमंत्री महोदय भी याद होगें जो नत्था की आत्महत्या के एलान के बाद नत्था और अपनी इमेज दोनों को बचाने के द्वन्द्व में फँसे रहते हैं. पर्दे पर इस किरदार को दमदार तरीके से निभाने के लिये आमिर खान प्रोडक्शन ने जिस कलाकार को चुना , वो थे रंगमंच के सशक्त अभिनेता और भा० ना० अ० , लखनऊ-रंगमंडल के प्रमुख श्री जुगल किशोर जी. पिछले दिनों एड्स पर आधारित त्रिपुरारी शर्मा द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक शिफ़ा की टीम के साथ जुगल जी बनारस में थे . स्थानीय समन्वय हमारी संस्था सेतु ही कर रही थी तो मुझे जुगल जी से कुछ बातें करने मौका मिल गया , जो हमेशा की तरह मेरे लिये एक खास अनुभव था.रंगमंच जीवन के यथार्थ से जुडा माध्यम है , जबकि सिनेमा को लार्जर दैन लाइफ़ कहा जाता है .दोनो ही माध्यमों में सबसे बडा फ़र्क है पहुँच का. जुगल जी ने बातचीत के दौरान कहा भी कि इस वक्त मैं आपसे यहाँ बैठा बातें कर रहा हूँ और दुनिया भर में जाने कितने लोग इसी वक्त मुझे सिनेमा के पर्दे पर देख रहे होंगे.नाटक में हमें रोज़ अपनी जगह ,अपने किरदार में मौजूद होना पडता है जबकि फ़िल्म एक बार बन जाये तो वो कालजयी हो जाती है. फिर उस कहानी में वो किरदार और किरदार के माध्यम से कलाकार हमेशा ज़िन्दा रहता है.और भी ढेरों बातें हुई और ये मुलाकात भी मेरे यादगार लम्हों में शामिल हो गयी.

बुधवार, 25 अगस्त 2010

एक मुलाकात-एक अनुभव ... !


२४ अगस्त को श्रीमती नादिरा ज़हीर बब्बर बनारस में थीं , अपने नाटक  आप कहें-हम सुनें  के साथ . मुझे एक मौका मिला उनसे मिलने और बात करने का. हमेशा की तरह एक मुलाकात और एक उपलब्धि रही मेरे हिस्से में. रक्षाबंधन का दिन .... , काफ़ी दिनों से काम में लगे रहने के बाद सारा दिन आराम करने का मूड...., उस पर सावन के कारे कजरारे बादलों की मनभावन आँख-मिचौली और टिप-टिप बरसती बूँदें....,कुल मिला कर घर से बाहर निकलना खुद पर बस एक जुल्म करने जैसा ही था. शाम तक जब बारिश तेज़ हो चली तो प्याज़ के पकौडे भी याद आने लगे,लेकिन नादिरा जी तक पहुँचने की जल्दी प्याज़ काटने और पकौडे तलने की मोहलत भला कब देने वाली थी तो बस बारिश में भीगते-भागते पहुँच ही गये हम उनसे मिलने और मिल कर सचमुच अच्छा लगा.
रंगमंच एक प्रतिष्ठित नाम , जिन्होंने अपना जीवन ही रंग कर्म को समर्पित कर दिया लेकिन मिलने पर पाया एक अति विनम्र कलाकार को ,जो मुझे बोलीं कि नहीं , मुझमें ऐसा भी कुछ खास नहीं , जिसकी इतनी तारीफ़ की जाय. उन्होंने ऐसा कहा लेकिन मैंने ये माना नहीं क्योंकि मैं जानती थी कि जिस शख्सियत के साथ मैं हूँ उसने अपने काम से सच्चा प्यार किया है, पूजा है और अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है और ऐसे लोग हमेशा आने वाली पीढियों के लिये आदर्श होते हैं, प्रेरणा की भूमिका निभाते हैं, रास्ता दिखाते हैं और बेशक तारीफ़ के काबिल होते हैं.

शनिवार, 7 अगस्त 2010

वो एक लड़की ...


मैं एक लड़की ...!
मुठ्ठी में भींचे कुछ उम्मीदें ,
पलकों में छुपाए चाँद सपनें ,
देखती हूँ ,हर रोज़ ,
आसमान की ओर ....,
सोचती हूँ ,क्या छू सकूंगी कभी
अपना आसमान ......?
मैं एक लड़की ......!
मुस्कान में कुछ दर्द तोलती ,
आंसुओं में थोड़ी आशा घोलती ,
देखती हूँ हर रोज़
चाँद की ओर ....,
सोचती हूँ ,क्या पा सकूंगी कभी
अपना चाँद .....?
मैं एक लड़की .....!
क्या कभी बदल सकूंगी हकीकत में अपने सारे ख्वाब ...?
मैं एक लड़की ...!!!
सोचती हूँ .....,सोचती जाती हूँ ...,
कि
तभी ,
पलकों से आंसू की एक बूँद
गिरती है मेरी हथेली पर
और
जैसे बोल पड़ती है मुस्कुरा करके ,
उदास मत हो ,मत हो निराश ,
वो दिन आयेगा ज़रूर ,
जब तुम अपने पंख पसार छुओगी
आसमान
और कहेंगे सब ---
" देखो अपने ख्वाबों को सच कर दिखला रही है ...,
अपने हिस्से के चाँद - सितारे - आसमान पा रही है ...,
वो एक लड़की !!!!!!!!!!!!

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

बस यूं ही .........

हाँ , बस यूं ही क्योंकि कभी - कभी कुछ बस यूं ही भी करना चाहिए । एक पुराना दर्द फिर उभरा हुआ है । नेट महोदय ने फिर हाथ खड़े कर दिए हैं पिछले लगभग एक सप्ताह से । वजह मत पूछिए । शायर का शेर याद आ गया - '' मुझसे मत पूछ मेरे दिल की कहानी हमदम , इसमें कुछ पर्दानशीनों के भी नाम आते हैं । '' अब पूरी तरह से ये मेरे हालात पर फिट नहीं बैठता , मगर मैंने पहले ही कहा न आज बस यूं ही । क्रोध तो बहुत आ रहा है , मगर ------

गुरुवार, 24 जून 2010

एक मजेदार विश्वास ... !



विश्वास के साथ मजेदार शब्द का प्रयोग कुछ अटपटा लग सकता है , लेकिन इसके अलावा कोई और शब्द सूझा भी नहीं , सो लिखना पड़ामेघ देवता को मनाने के लिए शहर में इन दिनों मेढक - मेढकी की शादीकराई जा रही है पता नहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश के सिवा कही और ये विश्वास है कि नहीं , लेकिन हमारे यहाँ तो इस रिवाज़ के साथ पूरा विश्वास जुड़ा हैअगर समय होने पर भी इंद्र देव मेहरबान हों तो इस शादी वाले टोटके के बाद वो ज़रूर पिघलतें है , ऐसी मान्यता हैबड़ी मज़ेदार होती है ये शादी , वो भी पूरे विधि - विधान के साथ......, पंडित जी मंत्रोच्चार करते हैं, दुल्हन सिन्दूर धारण करती है , दूल्हा - दुल्हन पवित्र अग्नि के फेरे लेते हैं , फिर नवयुगल के सुखद जीवन की कामना की जाती हैइतना सब करने के पीछे विश्वास होता है कि जब ये नव - विवाहित जोड़ा श्रंगार रस में डूब कर नृत्य करके मेघों का आह्वान करेगा तो घनघोर बारिश होगी । इस टोटके के लिए असली मेढक - मेढकी ढूंढें जाते हैं और ये न होने की स्थिति में प्लास्टिक के जोड़े से भी काम चलाया जा सकता है , बस नीयत साफ़ होनी चाहिए । है न एक मज़ेदार विश्वास । अब इस विश्वास का आधार क्या है , ये परखने का काम अपने - अपने विवेक पर छोड़ दिया गया है और एक बात बताऊँ ? कल बनारस में कई जोड़ों की शादी हुई और आज सुबह से ही तपते मौसम में कुछ राहत सी महसूस हो रही है । सुबह हलकी बारिश भी हुई । अब आप इसे चाहे जो कह लें । विश्वास है तो है ... और वो कहते है न विश्वास पर दुनिया कायम है !!!!!!!

गुरुवार, 17 जून 2010

खामोश ... राजनीति चालू आहे !


राजनीति यानी राजा की नीति ही प्रजा की नियति तय करती है इसलिए ये ज़रूरी है कि अच्छे और सच्चे लोग इस " कुरुक्षेत्र " में सक्रिय रूप से आगे आयें और राजनीति की धूमिल छवि को स्वच्छ करके इसे आगे ले चलेंइस बात की हिमायत और वकालत अक्सर ही की जाती रही है और हर बार बुद्धिजीवी वर्ग चाहे विनम्रता चाहे तल्खी के साथ इस प्रस्ताव को ख़ारिज करता रहा है । प्रकाश झा की राजनीति एक बार फिर इसी बात को पूरी ताकत के साथ ख़ारिज करती है। राजनीति एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती नज़र आती है कि इस कुरुक्षेत्र में अच्छे और सच्चे लोगों की न कोई जगह है , न ही कोई ज़रुरत । ये दरअसल काजल की वो कोठरी है , जिसमें कैसो भी सयानो जाय, काजल का दाग भाई लागे ही लागे !
सच्चाई , ईमानदारी और भावुकता इस धंधे की सबसे खतरनाक अयोग्यता है जो अंततः मौत के द्वार खोलती है और प्यार - मोहब्बत - दोस्ती - वफ़ा जैसे फ़ितूर सुनिश्चित विनाश के दरवाज़े तक पहुंचा देते हैं , यही है राजनीति... ! अपनी प्रतिष्ठा और दर्शकों की अपेक्षानुरूप प्रकाश झा ने एक सच्चाई उधेड़ती फिल्म प्रस्तुत कर के एक फ़िल्मकार के रूप में अपनी मेधा का परिचय तो दिया ही है साथ ही ये भी साबित कर दिया है कि बिना मुम्बईया लटके - झटके के भी एक सार्थक फिल्म को सराहने की तमीज भारतीय सिने दर्शक को हैपूरी फिल्म बिना सिचुएशनल गीत -संगीत की बैसाखी के आगे बढती है और अपनी बात कहने में कामयाब रहती हैबस एक प्रतीकात्मक भाव संप्रेषित करता हुआ गीत " मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं " बैक ग्राउंड स्कोर की तरह बजता है,बिना कोई व्यवधान डालेजैसा कि उत्सुकता थी और उम्मीद भी ,सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं के साथ एकाकार होते दिखाई पड़ते हैं , बस कुछ जगह कुछ बातें अखर जाती हैंजैसे एक बेहद छोटी और औचित्यहीन भूमिका में नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज का होनानसीर जिस मयार के कलाकार हैं , वहाँ दरअसल छोटी - बड़ी भूमिका से कोई फर्क नहीं भी पड़ता ,क्योंकि उनके होने से ही किरदार बड़ा हो जाता है लेकिन जिन लोगों ने फिल्म देखी है उन्होंने शायद महसूस किया हो , जिस तरह शुरुआत के बाद ही नसीर का किरदार कहानी से हमेशा - हमेशा के लिए गायब हो जाता है वो भी बिना कोई सूत्र छोड़े, वो हजम नहीं होताअजय देवगन लाख बेहतरीन अभिनेता सही, मगर वो नसीरुद्दीन शाह का एक्सटेंशन (कहानी के अनुसार) नहीं हो सकतेये बात कम से कम मुझ जैसे नसीर के प्रशंसकों के गले तो नहीं ही उतरती और तुरंत दिमाग में आता है ये ख़याल कि इतना ही करना था तो किसी और को भी लिया जा सकता था इस रोल के लिएदूसरी बात जो इस फिल्म को देखने के बाद अखरती है वो है कैटरीना कैफ के किरदार के इर्दगिर्द गढ़ा गया इस फिल्म का प्रमोशन - प्लानकैट के जिस तेवर और नेता वाले तेवर की हर ओर चर्चा है वो फिल्म ख़त्म होने के बमुश्किल पांच या दस मिनट पहले परदे पर आता है और गुज़र जाता है और दिमाग में कौंधता है दूसरा ख़याल कि बेशक राजनीति कैटरीना जैसी ग्लैमरस अभिनेत्री के कैरियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक है और बेशक उन्होंने इसमें अब तक का अपना बेहतरीन अभिनय किया है लेकिन अगर इस किरदार में कोई दूसरी अभिनेत्री भी होती तो कुछ ख़ास फर्क पड़ने वाला नहीं था और सबसे बढकर जो बात इस फिल्म को देखनेके बाद अखर जाती है , वो है इस फिल्म यानी राजनीति की हैप्पी एंडिंग ... और उसके बाद सब ख़ुशी - ख़ुशी रहने लगे वाले भाव को दर्शाता फिल्म का अंत दिमाग में बेसाख्ता ही तीसरे ख़याल को कौंधने पर मजबूर कर देता है कि ये तो राजनीति का अंत नहीं हो सकता ...... , ये अंत नहीं है ..... । दरअसल प्रकाश झा की राजनीति जहाँ ख़त्म होती है , वही असली राजनीति के शुरू होने का बिंदु हैहांलाकि ढाई - तीन घंटों में एक पूरे कथानक को समेटने की चुनौती से निपटने का यही सहज और सरल मार्ग था , लेकिन प्रकाश झा जैसे विज़नरी और साहसी फ़िल्मकार से चुनौतियों से निपटने के सरल मार्ग अपनाने की अपेक्षा कुछ कठिन और कठोर विकल्प अपनाने की अपेक्षा कीजानी चाहिए , जिस पर खरा उतरने से झा कुछ चूक गए । पूरी फिल्म में इमोशन या सेंटीमेंट्स का कोई काम नहीं थाभाई , चाचा , पिता ,पति, दोस्त ,प्रेमी , नौकर ,मालिक यहाँ तक की माँ की भी हर क्रिया - प्रतिक्रया राजनीति से प्रेरित थी , अगर ये सच्चाई को दिखाने की कोशिश थी तो इस सच्चाई को यहाँ तक उधेड़ देना चाहिए था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचाते ही इंदु (कैटरीना) भी इसी काजल में रंग कर छल - बल - साम-दाम - दंड - भेद की ताकत को पहचानती और सही अर्थों में राजनीति और सत्ता का मर्म समझ लेतीवो मर्म , जिसे समझ लेने के बाद इंसान कुछ और नहीं सोचता... , कुछ और नहीं समझता ..., कुछ और नहीं देखता... , सिवाय अपनी कुर्सी , स्वार्थपूर्ति और छल - छद्म के ..... !शायद ये अंत एक कड़वी हकीकत के और करीब होताबहरहाल राजनीति कम से कम आज के दौर की एक बेहतरीन फिल्म तो कही ही जा सकती हैसोये हुए को झकझोरने के लिए प्रकाश झा का शुक्रिया ... !

शनिवार, 29 मई 2010

इन लड़कियों को छूना है आसमां...


साल भर की मेहनत के बाद नतीजे निकलने का मौसम है । कहीं ख़ुशी - कहीं ग़म का आलम है । देश के सारे बोर्ड्स ने दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणाम घोषित कर दिए हैं । चूंकि ये मेरी कार्य सूची में शामिल है , मैं पिछले एक सप्ताह से सीबीएसई परीक्षा में टॉप करने वाले छात्र - छात्राओं का इंटरव्यू ले रही हूँ । काम तो अपनी जगह है ही , मगर उससे जुड़ा एक अलग ही एहसास है सफलता की खुशी से दमकते उन चेहरों को देखना , उनकी बातें सुनना और उनकी आँखों में जगमगा रहे सुनहले सपनों को उनके साथ बांटना...... और उससे भी बढ़ कर सुखद अनुभूति है इस सफलता की ऊंचाइयों पर अपना परचम बुलंद करने वाली बच्चियों से मिलना । अपने स्कूल और विषयों में टॉप करने वाली इन विजेता लड़कियों से मिलना, देश और समाज के आगामी उज्ज्वल भविष्य से मिलने जैसा है । बहुत करीब से देखती हूँ मैं , इनकी आँखों में अपने भविष्य और स्वप्नों को ले कर कोई संशय नहीं है , न ही मन कोई खौफ़ है किसी से हार जाने या पिछड़ जाने का। खुद पर इतना अटल विश्वास की पर्वत भी हैरान हो जाये , अपने लक्ष्य के प्रति ऐसा समर्पण की किसी किन्तु - परन्तु की कोई गुंजाइश ही नहीं । दिल - दिमाग एक क्षण के लिए भी अपने मार्ग से विचलित न हो , इरादों में ऐसी दृढ़ता ... । ऐसी बेटियों से मिलने और उनसे बात करने को मैं अपनी उपलब्धि मानती हूँ । हर साल परीक्षा परिणामों के घोषित होने के साथ ही अख़बारों में छा जातीं है सुर्खियाँ एक बार फिर बेटियों के बाज़ी मारने की । इस बार भी वही जाना -पहचाना नज़ारा है । मैं मन ही मन गद - गद हूँ , लेकिन हमेशा की तरह है मन में एक संशय भी , कि इन बेटियों को अपने सपनों का आकाश छूने के जिस मजबूत सीढ़ी की ज़रुरत होगी , क्या हम वो उन्हें दे पाएंगे ? कहीं ये सुनहले सपने बीच राह में ही हार तो नहीं मन बैठेंगे । क्या हम अपनी बेटियों का हाथ थाम कर उन्हें उनकी मनचाही मंजिल तक पहुंचाने में उनके सच्चे साथी बनेगे ? अगर आपका जवाब हाँ में है तो आपको बहुत - बहुत बधाइयां ... !

मंगलवार, 25 मई 2010

बस एक पल .............!


" मौत का एक दिन मुईन है " ये लिखते समय यक़ीनन ग़ालिब भी इस हकीकत से वाकिफ़ रहे होगें कि ये मामला दरअसल एक दिन नहीं ,बल्कि महज एक पल का हैबस ...... एक ...... पल ..... ! या फिर उसका भी हजारवां हिस्सा ..... , बस इतना सा ही फ़ासला होता है ज़िन्दगी और मौत के बीचइतनी ही देर लगती है हैं से थे होने मेंलिखना और भी बहुत कुछ चाहती हूँ मगर पता है , ये वक्त फ़लसफ़ा झाड़ने का नहीं सख्त अफ़सोस करने का है । विश्व की महाशक्तियों में शुमार होने के लिए कमर कसे हमारे देश में एक विख्यात उड्डयन कंपनी का विमान रनवे पर सुरक्षित उतरने में नाकाम रहा और १५८ लोग रात की नींद टूटने से पहले ही हमेशा के लिए मौत की गोद में सो गए । एक ऐसा भीषण हादसा , जिसने हर सुनने वाले का दिल दहला दिया । गलती किसकी थी , चूक कहाँ हुयी ,कारण क्या थे , ये सब जानने के लिए जाँच एजेंसियों को काम मिल चुकाहै । फ़िलहाल सारा दोष विदेशी पायलेट के सिर मढ़ा जा रहा है । ये आसान भी है क्योंकि वो बेचारा तो अब अपनी सफाई देने आने से रहा । लेकिन सौ बात कि एक बात ये कि जो चिराग उजाला होने के साथ ही बुझ गए उनमे अब फिर कभी रौशनी नहीं आयेगी ।

सोमवार, 24 मई 2010

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है ?


आजकल मेरे शहर में प्रगति कार्य ज़ोरों पर है और चूंकि मेरे शहर में हर प्रगति कार्य की शुरुआत सड़क की खुदाई से होती है इसलिए अब आलम ये है कि शहर की लगभग सारी मुख्य सड़कें या तो खोदी जा चुकी हैं या फिर खोदी जाने वाली हैं इस अनवरत और धुआंधार सड़क खुदाई के चलते मेरा शहर मैदानी से पहाड़ी और शहरी से ग्रामीण क्षेत्र में तब्दील हो चुका है चूंकि प्रगति की बहुत जल्दी थी इसलिए ये व्यवस्था नहीं बनाई गयी कि एक काम पूरा हो जाने के बाद ही दूसरे काम में हाथ लगाया जाये और हर तरफ एक साथ ही काम शुरू हो गया अब अगर घर से ऑफिस की दूरी घड़ी देख कर आधे घंटे की है तो बेहतर ये होगा कि घर से दो घंटे (बिना किसी अतिश्योक्ति के) पहले निकला जाए वरना टाइम पर पहुँचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है कारण --- हर मुख्य चौराहे और रास्ते पर बेतहाशा - बेतरतीब जाम तेज़ धूप, चिलचिलाती गर्मी में घंटो जाम में फंसने का दर्द वही जानता है जिसने ये त्रासदी झेली हो इस स्थिति का असर धीरे - धीरे ज़हर सा फैलता जा रहा है पहले जहाँ रिक्शे और ऑटो वालों से झिक - झिक की नौबत कभी - कभार ही आती थी वहाँ अब शायद ही कोई दिन हो जब ऐसा होता हो लगता है सब पगला गए हैं धूल - धूप - गर्मी - जाम और घंटों की फजीहत से बौखलाए लोग जैसे दिमागी संतुलन खोते से जा रहे हैं एक तरह की मानसिक त्रासदी के शिकार होते जा रहे हैं सब के सब दिमाग और शरीर की ऊर्जा सडकों पर खोने के बाद घर पहुँचने पर इतनी हिम्मत भी बाकी नहीं रहती कि सुकून के चन्द पल घरवालों के साथ बिताये जा सके दिन भर दिलोज़ेहन में इकट्ठा तनाव और शोरगुल इस हालत में नहीं छोड़ता कि शाम के कुछ लम्हे चैन से गुज़ारे जाएँ