शनिवार, 29 अगस्त 2009

(18) आँखें ... !


चुप भी रहूं तो आँखें बोलती हैं ,
न जाने कितने पोशीदा राज़ खोलती हैं ,
दिल का हाल चेहरे पर लाती हैं
और दुनियां भर को बताती हैं ,
यूं तो मैं परेशान नहीं ,
क्योंकि इस बात से अनजान नहीं ,
कि इस बेशुमार भीड़ में
मेरी आंखों की भाषा जानने वाला
कोई भी इंसान नहीं ,
हां ...
डर है तो सिर्फ़ तुमसे ,
क्योंकि तुम ही हो ,
जो , मेरा चेहरा पढ़ लेते हो
और
सुन लेते हो ,वो सब भी ,
जो मेरी आँखें बोलती हैं ... !
''मैं'' प्रतिमा............

रविवार, 23 अगस्त 2009

(17) उलझन...!


तुम मेरे कितने करीब हो ...!
इतने ,
कि हाथ बढ़ा कर छूं लूं तुम्हें ,
आवाज़ देकर बुला लूं तुम्हें ,
नज़रें उठा कर देख लूं तुम्हें ,
तुम्हारे जिस्म की खुशबू से ,
पहचान लूं तुम्हें ,
फिर भी कितनी दूर ...,
कि
मैं तुम्हें छू नही पाती ,
तुम्हें बुला नही पाती ,
तुम्हें देख नही पाती ,
ये
चंद क़दमों का फासला
जाने क्यूं ,
सदियों में भी तय नहीं होता ... !


''मैं '' प्रतिमा ........ !

बुधवार, 19 अगस्त 2009

(16) उनके शब्दों में ...!

बहुत दिनों बाद ख़ुद से मुखातिब हुई हूं। हाँ... लिखना मेरे लिए अपने आपसे मिलने जैसा ही तो है । कुछ न लिखूं तो लगता है जैसे ख़ुद से मुलाकात नही हुई । इतने दिन ख़ुद से दूर कहां रही , क्या किया ...इन बातों की चर्चा शायद बेमतलब ही होगी । आज बैठी हूं तो कुछ दिल की कहना चाहती हूं ...!लेकिन कभी -कभी यूं भी तो होता है न कि दिल तो बहुत कुछ कहना चाहता हो मगर जेहन से अल्फाज़ ही गुम हो जायें । कुछ ऐसी ही कैफियत से गुज़र रही हूं और लगता है , आज अपने जज़्बात को जुबां देने के लिए मुझे किसी और के अल्फाज़ का सहारा लेना होगा । कोई ऐसा जो इस वक्त वाकई मुझे बयां कर सकता है ।श्रद्धेय बच्चन जी की ये कविता इस वक्त मुझे छूती हुई सी महसूस हो रही है .... (निशा - निमंत्रण से ...)

गीले बादल , पीले रजकण ,

सूखे पत्ते , रूखे तृन घन ,

ले कर चलता करता ' हरहर '- इसका गान समझ पायोगे ?

तुम तूफ़ान समझ पायोगे ?

गंध भरा यह मंद पवन था ,

लहराता इससे मधुबन था ,

सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान , समझ पायोगे ?

तुम तूफ़ान समझ पायोगे ?

तोड़ - मरोड़ ,विटप - लतिकाएँ ,

नोच -खसोट , कुसुम - कलिकाएँ ,

जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम , उड़ जाओगे !

तुम तूफ़ान समझ पाओगे ... ?

''मैं'' प्रतिमा...

शनिवार, 15 अगस्त 2009

(15) जश्ने आज़ादी सबको मुबारक ... !


आज़ादी की खूबसूरत सौगात ले कर आयी आज की तारीख हम सबके लिए एक ख़ास अहमियत रखती है । आज १५ अगस्त है । सुबह से ही गली - चौराहों , स्कूलों - कॉलेजों , ऑफिसों और रेडियो पर देश - भक्ति गीत बज रहे हैं । हर हाथ में तिरंगा शान से लहरा रहा है । जिसे देखो वही देश भक्ति के रंग में रंग कर इतरता फिर रहा है ।सचमुच बहुत ही अच्छा लग रहा है , मगर कल ... । कल शायद तारीख पुरानी पड़ते ही ये सारी बातें भी पुरानी हो जायेगीं । देश भक्ति के गीत बजने बंद हो जायेगें , दैनिक व्यस्तता में देश - प्रेम की बातें बिसरा दी जायेगीं और आज हाथ - हाथ में शान से लहरा रहा तिरंगा कल कचरे के डिब्बे में पहुँच जायेगा । माफ़ कीजियेगा अगर मेरी बातें बुरी लगें लेकिन क्या करूं सच यही है । आज़ादी के जश्न के मायने अब हमारे लिए एक छुट्टी से ज़्यादा नही रहे । कितना अच्छा हो , अगर हम आज के दिन घूमने - फिरने , पिक्चर देखने और मौज - मस्ती करने के साथ ही साथ एक बार ही सही अपने देश के बारे में सोच सकें । अपने बच्चों को आज़ादी के सही मायने समझा सकें और वाकई पूरी ईमानदारी से कह सकें - हाँ ... हमें भारतीय होने पर गर्व है । अगर आप ऐसा कर पाए हैं तो आपको स्वतंत्रता दिवस की असीम शुभ कामनाएँ ... !

मैं- प्रतिमा !!!

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

(14) एक दोस्त के लिए ... !


मेरे दोस्त
याद है न ... ,
तुमने दिया था
मेरी सोच को विस्तार ,
मेरे भावों को आकार ,
जगाया था विश्वास
स्नेह संबंधों पर ,
हृदय के अनुबंधों पर ,
थामा था मेरी डूबती उम्मीद का हाथ
और
जगाई थी आसकिरण
मेरे अंधेरों में ,
याद है न ... ,
तुमने ही दी थी मुझे
मेरी कल्पना ,
मेरी कल्पना को रंग ,
मेरे रंगों को इन्द्र - धनुष ,
मेरे इन्द्र - धनुष को आकाश
और
मेरे आकाश को चमकीला अनंत क्षितिज ,
याद है न
इतना कुछ दिया था तुमने मुझे ,
आज मैं भी तुम्हे कुछ देना चाहती हूं ,
मुट्ठी भर रंग ,
पलक भर स्वप्न ,
अंजुरी भर उम्मीद
और
एक असीम आकाश , संभावनों का ,
जिस पर तुम फिर से भर सको
नई उड़ान ,
फिर से सजा सको रंग ,
अपनी कल्पनाओं के ,
ढूढ़ सको फिर से वो सारे सपने ,
जो वक्त की गर्दिश में कहीं गुम से गए है ... !
( अपनी प्यारी दोस्त कल्पना के लिए , जिसका आज जन्मदिन है ...)

बुधवार, 12 अगस्त 2009

(13) संवेदना ... !


मुखर संवेदना
और
मौन अभिव्यक्ति के बीच
खड़ी हूं
चुपचाप
निःशब्द ,
हाथों में लिए असीम स्नेह
अनंत भावनाएँ ... ,
सूझ नही रही प्रेषण की कोई भाषा ... ,
मिल नही रहा कोई शब्द - सेतु ... ,
फिर भी
मन है आश्वस्त ,
है अटूट विश्वास ,
कि
बिना किसी शब्द के भी
प्रेषित हो रहा है
वो सब कुछ
तुम तक ... ,
जो कहना है मुझे ,
तुमसे ... !

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

(12) एक अनुत्तरित प्रश्न ... !


रहस्य तुम्हारे
सारे के सारे
जानना चाहती हूं मैं ... !
सारे आवरण
तोड़ कर पहुंचना चाहती हूं
तुम्हारे सच तक ... ,
तुम्हें देखना चाहती हूं
अपनी आंखों से ,
छूना चाहती हूं
अपने हाथों से ,
मिलना चाहती हूं तुमसे
बिना किसी माध्यम
बिना किसी निमित्त के ... ,
पूछना चाहती हूं तुमसे
बहुत कुछ ... ,
और
ये सारी इच्छाएं , मन में समेटे
बरसों से ढूढती फिर रही हूं
तुम्हें ,
अपने भीतर - बाहर
हर दिशा में ,
मगर
हर बार
हाथ आयी है असफलता
और
रह गया है
एक अनुत्तरित प्रश्न ...,
हे मेरे ईश्वर
तुम मुझे नजर क्यों नही आते ... ?

सोमवार, 10 अगस्त 2009

(11) एक उदास शाम ... !


पतझर में ,
शाख से टूट कर बिखरते ,
पीले पत्तों के साथ ,
कुछ और भी है ,
जो बिखर रहा है ,
वक्त है शायद ... ,
हर सुबह - दोपहर ,
शाम - रात के साथ ,
पल - पल बीतता
कुछ और भी है ,
जो गुज़र रहा है ,
वक्त है शायद ... ,
मगर ,
इस हर दम दौड़ती ,
तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में ,
वक्त के लगातार
बिखरते - गुज़रते जाने के बावजूद ,
कुछ और भी है ,
जो ,
मन के ही आस - पास कहीं ,
ठहर सा गया है ,
तुम्हारी याद है शायद ... !

शनिवार, 8 अगस्त 2009

(10) एक पुराने पन्ने से ...!

बरसों पहले स्कूल के आखरी सालों में ये कविता मैंने अपनी डायरी में लिखी थी । तब कुछ भी लिख कर किसी को दिखाने का ख़याल भी ज़ेहन में दूर - दूर तक नही होता था , बल्कि जो लिखा हो , उसे भी छुपाने की जुगत लगाई जाती थी , कि कहीं कोई पढ़ न ले । अब ये तो शायद इस कविता का नसीब था कि इसे आज मेरे आकाश में परवाज़ का मौका मिल गया वरना इतनी अच्छी तो ये नही थी । इस कविता में एक अजीब सा कच्चापन और अपरिपक्वता महसूस होती है जो शायद उस उम्र का तकाज़ा थी ...! ये मेरी उन चंद कविताओं में से एक है , जिनमे मैंने अपना नाम जोड़ा था ... !

जीवन की राह पर जो दीपक से जल रहे हैं ।
अपने ही हाथों अपनी किस्मत बदल रहे हैं ।
मत देखो सिर्फ़ उनको , जो भाग्य पे रोते हैं ,
उनसे भी लो सबक, जो गिरकर संभल रहे हैं ।
कर लो है जो भी करना , ये वक्त जा रहा है ,
चेतो , कि यूंही जीवन के क्षण निकल रहे हैं ।
हम कुछ नही कर सकते , सोचो न कभी, देखो ,
आकारहीन पत्थर प्रतिमा में ढल रहे हैं ।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

(9)एक शर्मनाक इतिहास ... !


मानव सभ्यता, बीत चुकी जिन घटनाओं से आज भी शर्मसार है , ये चित्र उन्ही में से एक का है । इतिहास का वो काला पृष्ठ , जिस पर नज़र पड़ते ही आज भी सबकी रूह फ़ना हो जाती है । क्या लिखा है इस काले पृष्ठ पर ... ? अंहकार, जिद और ग़ुस्से में पगलाए दुनिया के सबसे दम्भी , मगरूर और ताकतवर देश की काली करतूत का कच्चा चिठ्ठा... । दूसरा विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था , लेकिन इससे पहले मानव - इतिहास की सबसे भयावह त्रासदी घटने की प्रतीक्षा कर रही थी । छः महीने तक जापान के ६७ शहरों पर बमबारी करने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ० ट्रूमैन ने छः और नौ अगस्त , १९४५ को हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराने का आदेश दिया । आका के हुक्म की तामील हुयी । परमाणु बम गिराए गए और लगभग एक लाख चालीस हज़ार लोग मौत की आगोश में समा गए । जो बचे , उनके हिस्से आई ,मौत से भी बदतर ज़िन्दगी । एक अध्ययन के अनुसार , इस त्रासदी में बचे लोगों में से ज्यादातर विकिरण से फैले कैंसर और ल्यूकेमिया के कारण मारे गए और ये सिलसिला आज भी जारी है । अपनी सभ्यता , विवेक और विकास का ढोल पीटते ,आत्ममुग्धता में इतराते और अपने गौरवशाली (?) अतीत का प्रशस्तिगान करते मानव समाज के लिए इस भयावह हादसे का कलंक मिटा पाना असंभव है । ये एक ऐसी शर्मनाक याद है जिससे मानव सभ्यता कभी निजात नही पा सकती, और इससे भी ज़्यादा शर्म इस बात की , कि हमने इस खौफनाक तबाही से अब भी सबक नही लिया है । ख़तरनाक हथियारों को जमा कर लेने की होड़ में सबसे आगे रहना ही आज विकसित और शक्तिशाली का पैमाना है, और छोटा हो या बड़ा ,कोई भी इस पैमाना पर कम साबित नही होना चाहता । क्या डा० बशीर बद्र की ये पंक्तियां ताकत की हवस में पागल इंसानों को कोई सबक दे सकती हैं-
'' उम्र बीत जाती है एक घर बनने में , तुम तरस नही खाते बस्तियां जलने में ... ! ''
प्रतिमा सिन्हा ...

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

(8)मेरा आकाश ... !


रच रही हूं अपने ही हाथों अपना आकाश ...
सुंदर , सलोना,
आकांक्षाओं के सतरंगी इन्द्र - धनुष को ,
अपनी असीम अनंतता में समेटे ,
मेरे स्वप्नों के लिए नित नए क्षितिज रचता ,
मेरा अपना आकाश ... !

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

(7) ये राखी बंधन है ऐसा .... !

बरस बिता कर आख़िर आ गया वो दिन , जिसका इंतज़ार हर बहन और भाई को पूरे बरस रहता है । रक्षाबंधन का पर्व हमारी नैसर्गिक स्नेह भावना का मूर्त रूप है जो हमें याद दिलाता है कि दुनिया में अब भी कुछ है जिसका मोल नही लगाया जा सकता । लेकिन अफ़सोस , इस भौतिकवादी युग में सरे बाज़ार अपने ज़मीर का भी दाम लगा कर विकास का ढोल पीटने वाले हमारे समाज के तथाकथित वर्तमान नीतिनिर्माता अमोल को भी बेमोल कर देने के अपने हुनर से बाज़ नही आते हैं और देखते ही देखते इस पावन स्नेह बंधन पर भी दाम की पर्चियां चस्पा कर दी जाती हैं । राखी - पर्व के करीब आते ही हमें बताया जाने लगा कि अगर भाई ने अपनी प्यारी बहना को एक विशेष ब्रांड का मोबाइल फोन उपहार में नही दिया तो उसके प्यार की सच्चाई पर खतरा हो सकता है । अन्य दूसरे ब्रांड्स के और भी कीमती उपहार बाज़ार में भाई - बहन के प्यार को अपनी कसौटी पर कसने को तैयार शो केस की शोभा में वृद्धि कर रहे हैं । भाई किसी भी शुभ अवसर पर बहन को उपहार दे ये तो सचमुच अच्छी बात है मगर उपहार ही प्रेमाभिव्यक्ति की शुद्धता की कसौटी बन जाए ये अच्छी बात नही है । बचपन में लेन-देन की शर्त या उम्मीद पर उपजी स्नेह की कोमल कोंपल कभी - कभी आगे चल कर एक ऐसी बेल बन जाती है जो मन से लिपट कर तब बहुत तकलीफ देती है जब कोई उम्मीद पूरी न हो सके । आखिर बचपन की नन्ही आशाएँ हमेशा तो नन्ही नही रहती हैं न .......! राखी के इस पावन दिन भाई अपनी बहन को उपहार ज़रूर दे क्योंकि आख़िर ये हर बहन का हक भी है और हर भाई का फ़र्ज़ भी , मगर कितना अच्छा हो कि ये उपहार बाज़ार में कीमत दे कर खरीदी जा सकने वाली चीजों की बजाय वो सम्मान , वो आदर ,वो पाक जज्बा हो जिसकी हर स्त्री हकदार होती है । कितना अच्छा हो अगर इस पावन दिन हर भाई ,बहन के सम्मान की रक्षा का सचमुच संकल्प ले और सम्मान भी केवल अपनी सहोदरा बहन का नही , हर लड़की का । छेड़छाड़ की घटनाएं , यौनहिंसा की प्रताड़नाएं और बलात्कार के हादसे जब समाज में कभी न हो और हर घर की बहन - बेटी किसी भी सड़क चौराहे पर ख़ुद को महफूज़ महसूस कर सके तो समझो कि भाई ने बहन को सच्चा तोहफा दे दिया। रक्षा बंधन के दिन जब मैं भाईयों को कलाई पर राखी बंधे हुए और माथे पर शुभ तिलक लगाये देखती हूं तो सोचती हूं कि क्या इन्होनें लिया होगा नारी के सम्मान का संकल्प ... ?

प्रतिमा ...

रविवार, 2 अगस्त 2009

(6) दोस्ती ख़ुदा है ..........!

ज़मीं और आसमां मिल जाए ये तो फिर भी मुमकिन है , मगर एक दोस्त , दुनिया में बड़ी मुश्किल से मिलता है ।
अगर ये सच है तो मैंने इस सच को अपनी रूह की गहराईयों से जिया है । मेरी ज़िन्दगी में दोस्ती उस ताकत की तरह रही है , जिसने मुझे हर मुश्किल में संभाला है , वो प्रेरणा रही है , जिसने मुझे हमेशा सही राह दिखाई है , वो रौशनी रही है , जिसने मुझे हर अंधेरे से उबारा है । मैं शायद भावुक हो रही हूं लेकिन सच यही है, तो है । मेरे लिए दोस्ती कभी भी कोई ऐसा औपचारिक विषय नही रही जिस पर मैं कोई लेख लिखूं या विचार व्यक्त करूं । मैं इस लफ्ज़ को जीती आई हूं। ख़ुदा की ये नेमत मुझे सौगात में मिली है । ज़िन्दगी ऐसे भी कई मौके आए , जब ख़ुद से भी भरोसा उठ गया ,हर रास्ते बंद से महसूस हुए , लेकिन ऐसे वक्त में भी मेरी आखों में उम्मीद के दिए जलते रहे जिनकी लौ में मेरे दोस्तों का मुझ पर यकीन जगमगा रहा था। सोचती हूं आज फ्रेंडशिप डे के मौके पर अगर कुछ देना भी चाहूं तो क्या दूं उन्हें , जिन्होंने मुझे ज़िन्दगी पर और मुझ पर मेरा विश्वास दिया । क्या बाज़ार में सजे बेशकीमती कार्ड्स , गिफ्ट्स और सजावटी - बनावटी सामान काफ़ी हो पायेंगे , मेरा धन्यवाद उन तक पहुंचने में ? शायद नही ... !क्या दे सकती हूं मैं अपने दोस्तों को सिर्फ़ अपनी भावना और शुक्रिया के सिवा ... ।
शुक्रिया कि उन्होंने मुझ पर मुझसे बढ कर यकीन किया , मुझे मेरे ही रूप में स्वीकारा, मेरी हँसी ही नही मेरे आंसूयों का भी मोल जाना , मेरे साथ तब भी रहे , जब मेरा साया भी मेरा साथ छोड़ रहा था । मैंने अपनी कामयाबी के मोती और नाकामी की किरचें , दोनों ही अपने दोस्तों से बाटीं हैं और आज बस इतना ही कहना चाहती हूं कि मेरे लिए दोस्ती महज़ एक लफ्ज़ नही , ज़िन्दगी है... ,ख़ुदा है... । मैंने इसे जिया है और अगर आप भी हैं मेरी तरह खुशनसीब तो आपको भी फ्रेंडशिप डे की असीम शुभकामनाएँ ... !अपने दोस्तों को हमेशा अपने दिल के करीब रखियें क्योंकि यही वो मोती हैं जो ज़िन्दगी को आब देते हैं और जब कोई मुश्किल आन पड़े तो उस से लड़ कर जीतने की ताब देते हैं ।

'' मैं '' प्रतिमा ... !

शनिवार, 1 अगस्त 2009

(5)एक आदत सी बन गई है तू .....

कई दिनों बाद आज आपने आकाश में परवाज़ भरने का वक्त मिला है,लग रहा है कि जाने कितने दिन बीत गए ।
जब से आकाश का ये नन्हा सा कोना अपने लिए खोज निकला है, एक नया ही जोश महसूस कर रही हूँ । पिछले तीन दिन काफी व्यस्त बीते । ३१ जुलाई को विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती थी । इस अवसर पर हमारी सेतु सांस्कृतिक संस्था ने इस बार तीन दिवसीय आयोजन किया । पहले दिन ' प्रेमचंद साहित्य में नारी विमर्श ' विषय पर गोष्ठी , दूसरे दिन ' प्रेमचंद नाट्य पद यात्रा ' और तीसरे दिन ' प्रेमचंद जी के जन्म स्थान लमही गाँव में उनकी लिखी कहानिओं का नाट्य मंचन । सब कुछ बहुत ही रचनात्मक और संतुष्टिपूर्ण रहा । बनारस जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के शहर में हमने अपना प्रवाह बनाये रखा है ये हमारे लिए तोष का विषय है मगर ये एहसास भी है कि अभी बहुत कुछ करना है । मैंने विस्तृत आकाश का ये एक नन्हा पृष्ठ अपने लिए इसी लिए चुना है ताकि मै उन जाने - अजाने चेहरों और नामों तक पहुँच सकूं जिनकी सोच, विचार और कार्य विधि विशेष है । मैं भी उनसे जुड़ कर ख़ुद में नयापन और सृजनशीलता का विकास कर सकूं । आज अपने ब्लॉग पर तीन विशिष्ट जन के विचार अपने लिए पाकर मैं प्रफुल्लित हो उठी । लगा , अपना प्रयास सफल हो रहा है । अगर आप भी मेरे आकाश में मुझसे मिलें तो अपनी बेशकीमती राय ज़रूर दीजियेगा । मेरी लेखनी आपसे जुड़ कर और सशक्त होगी । मैं कह सकूंगी '' विस्तृत नभ का एक कोना आखिर मेरा हो ही गया '' ।

आकाश में अपने हिस्से के रंग तलाशती मैं ' प्रतिमा ' ...................... !