शनिवार, 19 दिसंबर 2009

कमाल है !

मैं चीजों को अपनी आँख से देख कर परखने की आदी हूँ , दूसरो की राय मुझ पर कम ही असर डालती है । लेकिन ये कोई शाश्वत सत्य नहीं । कभी - कभी स्थितियां इसके उलट भी हो जाती हैं । जैसा कि आज का उदहारण... । अभी - अभी "पा " से मिल कर लौटी हूँ और मन भावों से भरा हुआ है । रविश कुमार जी के कस्बे में अक्सर ही आना - जाना होता है । बहुत सारी बातें दिल के बहुत करीब आ कर छू जाती हैं ,जैसे उनकी वन रूम सेटहा , दिल्ली की जिंदगी का रोजनामचा । जब उनका दावा पढ़ा कि "पा " सिर्फ "पा " की फिल्म नहीं और भी बहुत कुछ है , सच कहूं , तब से ही मन में खलबली मची हुई थी कि कितनी जल्दी इस फिल्म को देख डालूँ । वैसे मैं फिल्म रिलीज़ होने के तीन - चार हफ़्तों के बाद ही (अगर वो सिनेमा घर में लगी रह जाए तो ...) देखना पसंद करती हूँ लेकिन शायद रविश जी की समीक्षात्मक पोस्ट का ही असर था कि मैंने दूसरा हफ्ता पूरा होते ही इसे देख लिया और अब मैं निर्विवाद रूप से कह सकती हूँ कि ........."सचमुच कमाल है !" कहानी , ट्रीटमेंट , प्रस्तुतीकरण बेहद प्रभावशाली बन पड़े हैं । ये एक नेकनीयत से बनाई गयी फिल्म है जो कई मायनों में हतप्रभ करती है, क्योंकि पूरी फिल्म में बनावट का कहीं नाम-ओ-निशान भी नहीं । अभिषेक बच्चन , परेश रावल , अरुंधती नाग को उनके किरदारों से अलग कर के देख पाने की कोशिश नाकाम हो जाती है । विद्या बालन शायद डाक्टर विद्या ही है , याद करना मुश्किल होता है कि इससे पहले किसी दूसरे किरदार में भी उन्हें देखा है। अपने किरदार की इतनी मौलिक , इतनी असली और इतनी विश्वसनीय छवि उकेर पाने का श्रेय विद्या को दे या निर्देशक बाल्की को , ये तय कर पाना कुछ कठिन है । साफ़ कर दूं कि विद्या बालन मेरी पसंदीदा अभिनेत्री कतई नहीं हैं , मगर "पा " देखने के बाद सिवाय इस प्रतिक्रिया के,मेरे पास कुछ और नहीं है । और अमिताभ बच्चन ......, उनको देखने के बाद तो मन में उठता है बस एक ही सवाल कि 'अब और ... क्या ?' अभी और कितने परीक्षण बाकी हैं "बिग बी " की प्रयोगशाला में । जिस देश में चालीस तक पहुंचते-पहुंचते ये कहने का रिवाज़ हो कि ' अब क्या नया करना ..., अब तो बुढ़ा गए । ' वहाँ असल बुढापे तक यौवन की उर्जा , जोश और जीजिविषा की ऐसी हनक बनाए रखने वाले को महानायक नहीं तो और क्या कहा जायेगा ! झुर्रीदार चेहरों के साथ जबरन रोमांटिक होने का मुगालता जीते अभिनेताओं के लिए अमिताभ बच्चन साक्षात् किवदंती हैं । ऐसे विविध किरदार , वोभी इस उम्र में, किसी को भी जलन हो सकती है। मुझे ख़ुशी है कि मैंने सही समय पर कसबे से इसके बारे में सूचना पायी और अपने व्यस्त होने के सारे बहाने दरकिनार कर के ये फिल्म देख आई । आप भी इसे एक बार ज़रूर देखें । वैसे भी आजकल अच्छी फ़िल्में देखने का सुअवसर कम ही मिलता है ।
प्रतिमा !

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

सरोद घर


पिछ्ले दिनो ग्वलियर जाना हुआ। सांस्कृतिक विरासत का निगहबान शहर , जिसे देख कर इतिहास से रूबरू होने की अनुभूति होती है । सिंधिया राजपरिवार का वैभवशाली अतीत समेटे जय विलास पैलेस , लगभग छः से भी ज़्यादा दशको का इतिहास संजोये ग्वालियर का किला , राजामानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी की प्रेम कहानी का साक्षी गूजरी महल ,मोहम्मद गॉस और तानसेन का मकबरा सब कुछ विस्मित कर देने वाला है । लेकिन इन्ही सब के बीच शहर के जीवाजी गंज क्षेत्र में है एक ऐसी इमारत, जो बहुत ही गरिमा और गहन दायित्व बोध के साथ न सिर्फ़ ग्वालियर , बल्कि पूरे भारत की सांगीतिक विरासत को सहेजे हुए है और उस इमारत का नाम है सरोद घर । नाम से ही स्पष्ट होता है कि सरोद घर में प्राचीन भारतीय संगीत वाद्य यंत्रो को संजो कर रखा गया है । इस नायाब संग्रहालय में सरोद , वायलिन ,रूद्र वीणा , सितार , तानपूरा , सुरमंडल, तबला देवप्रतिमाओ की तरह पूजित स्थान पर रखे गए हैं और ये वाद्य यन्त्र अति विशिष्ट भी हैं ,क्योकि इन्हें किसी बाज़ार या दुकान से खरीद कर नही सजाया गया है बल्कि ये भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गुरुजन के उपयोग किए हुए , निजी वाद्य यन्त्र हैं जिन्हें यहाँ संगृहीत करने के लिए उनके प्रियजन या परिजन द्वारा उपलब्ध कराया गया है । इसके अतिरिक्त सरोद घर में शास्त्रीय संगीत की लगभग सभी महान हस्तियों की तस्वीरो का भी संग्रह किया गया है जो इस स्थान को और भी पूज्य बनता है । पर इस स्थान की महिमा बखानने को शायद इतना ही काफ़ी नही होगा क्योकि इस सरोद घर की सबसे बड़ी खासियत है इसका उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहेब और उस्ताद अमज़द अली खान साहेब का अपना घर होना । एक अजब सी खुशबू है जो इस घर में घुसते ही सारे वजूद को घेर सी लेती है । मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सामने आँगन में उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहेब की मूर्ती पर नज़र पड़ती है और लगता है जैसे आशीष मिल गया । गेरुए गुलाबी और आफ व्हाईट रंग के संगमरमरी पत्थरो से तराशा गया सा ये खूबसूरत घर मानो हरियाली का पैराहन पहने इतरा सा रहा है अपनी किस्मत पर .चारो ओर हरे - भरे पौधे , आँगन के बीच में नीम का पेड़ , एक अजब रूहानी सुकून उस वक्त कुछ और बढ़ सा जाता है जब ये मालूम चले कि इसी पाक घर में उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहेब रहा करते थे , रियाज़ किया करते थे और इसी नीम के तले उस्ताद अमज़द अली खान साहेब सुरों में अपना जीवन तलाशा करते थे और इसी आँगन में उस्तादों के आशीर्वाद और पिता की निगरानी में अमान अली और अयान अली बंगश ने अपनी महान सांगीतिक विरासत को सँभालने का जिम्मा अपने मज़बूत कंधो पर लिया था । सच ये अद्भुत अनुभूतियाँ वहा जा कर ही समझी जा सकती हैं । ये सरोद घर उस्ताद अमज़द खान साहेब का निजी प्रयास और योगदान है जो अतुलनीय है । अगर आप भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय संगीत परम्परा में आस्था व श्रद्धा रखते है और ग्वालियर जाने वाले है तो सरोद घर ज़रूर जाइयेगा ,आपको बेहद खुशी होगी और अपनी विरासत पर फख्र भी ... !
"मैं " प्रतिमा !!!