मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

क़ैद में ज़िन्दगी !


लॉक डाउन का पाँचवा दिन है।


सुबह-सुबह पुलिस की जीप और अनाउंसमेंट से आँख खुलती है, “आप लोग कृपया ध्यान दीजिए। अनावश्यक रूप से सड़कों पर न निकलें। अपने-अपने घरों में जाएं।
मैं घर में ही हूँ।
अपने कमरे की सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की से बाहर देखती हूँ। तकरीबन दो सौ
मीटर लम्बी उसके आगे एक घुमाव लेती सड़क पर लोगों की आवाजाही लगी हुई है। स्कूटर, साइकिल, पैदल, ठेला, लोग चल रहे हैं। सड़क पर एक तरफ़ हॉस्पिटल और दूसरी तरफ़ दवा की दुकानें हैं। कुछ लोग जो दवाएं लेने आये हैं, मैं उनके लिए दुआ करती हूँ।
फलों और सब्ज़ी के ठेलों पर कुछ भीड़ सी लगी है। हर कोई हड़बड़ी में दिख रहा है। खरीदने वाले ज़रूरत भर सामान ले कर निश्चिन्त होना चाह रहे हैं और ठेले वाला इस जल्दी में कि सारा माल बिक जाये ताकि उसके पास भी अगले कुछ दिनों के लिए निश्चिन्त होने का सामान हो सके। मैं अपनी खिड़की से उसे देखते हुए सोच रही हूँ कि इसे अपने घर के लिए भी कुछ सब्ज़ी अलग से रख लेनी चहिये। उम्मीद है रख ली होगी।
ऊपर से शांत दिख रहा सड़क पर चल रहा हर शख्स भीतर ही भीतर एक अजीब अफरा-तफरी में है।
दिन के ग्यारह बजते - बजते सड़क आहिस्ता - आहिस्ता ख़ाली होने लगती है। आम दिनों में ट्रैफ़िक जाम और हॉर्न की आवाज़ से भरी सड़क पर सन्नाटा पसर जाता है। ज़रूरी सामान लेने घरों के बाहर निकले लोग वापस घरों में दुबक जाते हैं। सभी होम अरेस्ट हैं।
पुलिस जीप से दिन भर में कम से कम दस बार एनाउंसमेंट होता है, ‘लॉक डाउन चल रहा है. घरों के अन्दर रहें।
मैं अपने तीसरी मंजिल पर बने कमरे की खिड़की से अन्दर रह कर भी बाहर देख सकती हूँ। गलियों के शहर मेरे बनारसमें बहुत से लोगों को शायद यह सहूलियत नहीं है। वो गलियों में रहते हैं। सड़क तक आने के लिए उन्हें कभी-कभी आधा किलोमीटर तक चलना पड़ता है।उनकी परेशानी दूसरे तरह की है। बनारस जैसे मिज़ाजी शहर में लॉक डाउनका मतलब है अपनेआप से ही दूर हो जाना। नेमी लोग मन्दिर नहीं जा पा रहे। गंगा मईया का दर्शन, पूजन, स्नान नहीं कर पा रहे। कचौड़ी-जलेबी-मलाई-रबड़ी तो दूर जीवन का आधार पान का मिलना भी मुहाल हो गया है। ऐसे जीवन के बारे में किसी ने नहीं सोचा था। हमने बड़े से बड़े संकट से जूझने की, बड़ी से बड़ी लड़ाई में जीतने की तैयारी कर रखी थी मगर इसकी नहीं। दुश्मन सामने हो तो हम सीना ठोंक कर घर से चिल्लाते-गरियाते बाहर निकलने और निपट लेने की धमकी देने में तो एक्सपर्ट थे लेकिन दुश्मन की आशंका से ही घर के भीतर कैद हो जाने का विचार तक हमारी संस्कृति में नहीं था अमल तो दूर की बात है। फिर ऐसे दुश्मन का किया भी क्या जाए जो अदृश्य है। अदृश्य दुश्मन से तो कोई अदृश्य शक्ति ही बचा सकती है। अभी तो महादेव भी कुछ नहीं कर रहे। सुना है वह भी लॉक डाउन में हैं तो सिवाय प्रतीक्षा की कोई दूसरा रास्ता नहीं।

मेरे कमरे की खिड़की से ठीक सामने सड़क के उस पार की इमारत की छत पर एक जोड़ा बंदर-बंदरिया रोज़ बैठ कर अपना समय बिताया करते हैं। निर्विकार, निर्लिप्त भाव से एक-दूसरे की जुएँ बीनते या करवट लेकर एक मुद्रा में देर तक पड़े हुए. कभी कभी दोनों में से कोई एक उठ कर थोड़ी दूर तक टहलने चला जाता है और दूसरा बड़े ही अन्यमनस्क भाव से पड़ा-पड़ा उसे जाते, फिर लौटते देखता रहता है। घर की कुछ ना खुलने वाली खिड़कियों के बाहरी हिस्से में बहुत सारे कबूतरों ने डेरा बना रखा है। यह हाल सारे शहर में है। सड़क पर कुत्ते, गाय आराम से कहीं भी बैठे नज़र आते हैं। उनको अब तेज़ भागती गाड़ियों का खौफ़ नहीं रहा। आजकल सुबह शाम तरह-तरह के पक्षियों और चिड़ियों की चहचहाहट साफ़ सुनाई दे रही है। मैं अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ कि क्या इन जीव-जन्तुओं को इस समय मनुष्य पर मंडराते भयावह संकट का कोई आभास होगा ? क्या इस बात से उन्हें कोई फ़र्क पड़ता होगा ? या ये पक्षी, जानवर, और दूसरे जीव प्रकृति पर शासन करने का दम्भ पाले हुए मनुष्यों को इस समय ख़ुद ही डरा हुआ देख मन ही मन राहत या बदला पूरा होने जैसी ख़ुशी महसूस कर रहे होंगे ? अगले ही पल अपनी इस अजीबोग़रीब कल्पना पर ख़ुद ही मुस्कुराती हूँ।

लॉक डाउन का छठा दिन है और ऐसा सिर्फ मेरे कमरे की खिड़की के बाहर बिछी 200 मीटर लंबी सड़क पर नहीं बल्कि सवा अरब जनसंख्या वाले हमारे पूरे देश है। 


सांस्कृतिक विभिन्नताओं और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं वाले इस देश में पहली बार है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से बंगाल तक सब एक ही रफ़्तार का शिकार हो गए हैं। न कोई ज़्यादा धीमा, न कोई ज़्यादा तेज़। अमीर-ग़रीब, मूर्ख-ज्ञानी सबकी दिनचर्या समान हो गयी है। देश इसके लिए तैयार ही नहीं था। होता भी कैसे ? पिछली चार पीढ़ियों के लोगों के लिए यह ऐसा पहला तजरबा जो है। इस नातजुर्बेकारी ने कुछ खौफ़नाक मंज़र भी दिखाये हैं।
कल सुबह के अखबारों और समाचारों में दिखाई देती तस्वीरों ने अच्छे अच्छों का दिल बैठा दिया है। दिल्ली में अपने-अपने घरों की ओर लौट पड़े लाखों लोगों की भीड़. रोज़गार, ठिकाना ही नहीं अपना भरोसा और उम्मीद खो चुके, अपने शहरों की ओर लौट रहे, नहीं बल्कि भाग रहे ये लोग, इस बात से बेअसर, बेफ़िक्र कि बाक़ी देश इस वक़्त उन्हें एक बड़े ख़तरे की तरह देख रहा है। घर लौट कर भी लौट नहीं सके हैं ये। थकान, भूख, प्यास से बचते हुए पहुँचे उन्हें बाहर ही रोका गया। कीटनाशक दवा से नहलाया गया। अपने ही देश में शरणार्थी बने सिर पर सामान और गोद में बच्चे उठाये मीलों पैदल चले जाते ये लोग 1947 के बंटवारे का दृश्य याद कराते रहे। तर्क ये है कि इन्हें, जहाँ थे, वहीँ रुकना चाहिए था। तथ्य ये है कि इन्हें, जहाँ थे वहाँ सुरक्षित व बेफ़िक्र होने का वो भरोसा नहीं दिलाया जा सका। अब वो ख़तरे के सन्देशवाहक बन कर चारों तरफ़ बिखर गये हैं। ग़लती किसकी ? पता नहीं। आशंका है कि कहीं सबको ख़ामियाज़ा न भुगतना पड़े।

यह लॉक डाउन दुनिया भर में है। वाशिंगटन में रहने वाली भाभी ने मैसेज में बताया है। सभी ‘क्वेरेंटाइन’ में हैं। स्वीडेन से एक दोस्त का वॉयस मैसेज मिला है। उसे जून तक वहीँ ज़िन्दा रहने का संघर्ष करना होगा। वापसी के बाद भी सब कुछ तुरन्त ठीक होने के आसार कम हैं। पहली बार सारी दुनिया डरी हुई है।

लॉक डाउन का सातवाँ दिन है। मैं कुछ कुछ दार्शनिक हो रही हूँ। कुदरत के सिलेबस में कोई ऐसा भी चैप्टर है, किसने सोचा था


सन 2020 की रॉकेट से भी तेज़ स्पीड वाली ज़िन्दगी कितनी अच्छी कट रही थी। दिन के घण्टों से ज़्यादा तो अप्वाइंटमेंट होते थे हमारे। एक पूरी भीड़ थी जो हमें हमारे होनेका बोध कराती थी। हर सुबह को नया तमाशा, हर रात नया जश्न। एक छद्म संतुष्टि, एक खोखली पहचान, एक शोर भरी संस्तुति ही सही लेकिन ज़िन्दगी तो मस्त थी। मानो कोई कमी नहीं। सब कुछ ख़रीदने के आदी थे। खाने से लेकर ख़ुशी तक... हर चीज़ ऑनलाइन। बस वक़्त नहीं था। अब वक़्त मिला है तो पता ही नहीं कि इसका करना क्या है ? इतने सारे वक़्त को सिर्फ़ अपने साथ रह कर जीना हमें आता ही नहीं ? सुपरफास्ट लाइफ़ को जैसे कोई पॉवर ब्रेक लग गया है।
अच्छा है कि यह लॉक डाउन किसी गृहयुद्ध या विश्व युद्ध के कारण नहीं हुआ है। शुक्र है कि इस लॉक डाउन में हमें अपने पड़ोस रहने वाले किसी दूसरे मजहब के लोगों से कोई ख़तरा नहीं है। इसीलिए हम फ़िलहाल एक-दूसरे को जान से मारने की कोई योजना नहीं बना रहे। इसके लिए कोई हथियार या रणनीति तैयार नहीं कर रहे। गनीमत है कि इस ख़तरे से निपटने के लिए हमें अपने-अपने लोगों के साथ झुण्ड, सेना, जुलूस या भीड़ की शक्ल में बाहर निकल कर नारे लगाते हुए शक्ति प्रदर्शन नहीं करना है बल्कि हमें एक-दूसरे से बहुत दूर अपने-अपने घरों में सिमटे रहना है। जो जितना दूर, जितना अकेला होगा वो अपने लिए, अपनों के लिए उतना ही महफूज़ होगा।
सोचने की बात है। हमने किस-किस को अपना दुश्मन माना। ज़ात, धर्म, हिंदू, मुसलमान, ईराक़, ईरान, अमेरिका, जापान. गोरा, काला, अगड़ा, पिछड़ा, पड़ोसी मुल्क तो खैर एक-दूसरे के खून के प्यासे रहते ही हैं। अपनी-अपनी कौम को मज़बूत करने की जुगत लगाते रहे ताकि दूसरी कौम को मारकर ज़िन्दा रहें। सारी दुनिया में एकछत्र राज कर सकें। एक दूसरे पर हमला करना ही रक्षा का तरीका समझते रहे।
प्रकृति ने एक बार फिर हमें समझाया है कि हमारी ख़ुद की हैसियत एक जीव से ज़्यादा की नहीं। बुरा न लगे तो जीवको ‘कीड़ा’ भी पढ़ा जा सकता है। हमें दरअसल अपनेआप से ही ख़तरा है। ख़ुद को बचाने के लिए कहीं हमला नहीं करना बल्कि अपनेआप को किसी एकांत में, आइसोलेशन में डाल देना है। किसी और से नहीं अपने अंदर पल रही विषाक्तता से जीतना है। दूसरों के लिए निरंतर प्रार्थना करते रहना है। कुदरत का कहर दीन-धर्म, रंग-नस्ल देख कर नहीं आता। हॉलीवुड की फ़िल्मों की तरह पहली बार पूरी मानवजाति ख़तरे में है.
प्रकृति अब अपनी सत्ता फिर से अपने हाथ में लेने जा रही है। आने वाले समय में हमें प्रकृति की इस ताकत के आगे नतमस्तक होना होगा। इस ताकत का मुक़ाबला किसी श्लोक-मन्त्र अथवा आयत-कलमे से नहीं बल्कि सिर्फ़ विज्ञान से किया जा सकता है और विज्ञान प्रकृति के ही अनंत रहस्यकोष में छुपी हुई वह कुंजी है जिससे कुछ रहस्यों को खोलने में इंसान कामयाब हो जाता है। अगर आप विज्ञान को मनुष्य की उपलब्धि समझते हैं तो जान लीजिये कि अभी मात्र .00001 (दशमलव शून्य, शून्य, शून्य, शून्य एक) प्रतिशत  ही रहस्य खोल पाने में मनुष्य सफल हो सका है।

लॉक डाउन का आठवाँ दिन है और मैं इस लम्बी, एकाकी समयावधि की सार्थकता के बारे में सोच रही हूँ। 


हमारा सबसे प्रिय और सुलभ बहाना ‘क्या करें ? वक़्त ही नहीं मिलता।’ अभी के लिए अपना अर्थ खो चुका है लेकिन इस अतिरिक्त मिले वक़्त में हमें सब कुछ मनचाहा कर पाने की छूट नहीं मिली है। जैसे ढेर सारे प्रतिबंधों में घिरे अतिरिक्त ओवर्स, जो चाहे वो शॉट नहीं मार सकते। घर की सीमाओं में रह कर क्या कर सकते हैं हम ? कुछ गढ़ सकते हैं, रच सकते हैं, सहेज सकते हैं, जी सकते हैं। सोशल मीडिया पर बच्चों के साथ खेलते, कहानियाँ सुनाते पिताओं की तस्वीरें, पत्नी के कामों में हाथ बंटाते पतियों की तस्वीरें, घर के अन्दर मिलजुल कर खिलखिलाते चेहरे वाली तस्वीरें सुख पहुँचा रही हैं लेकिन कब तक ? थक जाना, ऊब जाना मानव स्वभाव है। फिर उसके बाद क्या ? सुना है पिछले छः दिनों में थम सी गयी इंसानी रफ़्तार के चलते प्रदूषण अचानक कम हो गया है. शोर कम हो गया है। हवा में घुला ज़हर घट रहा है। ओज़ोन लेयर रिपेयर हो रही है। पृथ्वी कुछ दिनों के लिए स्वास्थ्य लाभ कर रही है लेकिन यह शाश्वत नहीं है। यह लॉक डाउन ख़त्म हो जायेगा। जीवन धीरे-धीरे ही सही अपने ढर्रे पर लौट आयेगा। सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा लेकिन क्या हम भी पहले जैसे रहेंगे या कुछ बदलेगा हममें ? क्या हम पहले से कुछ ज़्यादा समझदार हो पाएंगे ? अपनी रफ़्तार पर संयम लगाना सीख सकेंगे ? स्वीकार कर सकेंगे कि सबसे शक्तिशाली हम नहीं बल्कि प्रकृति है ?
मैं सोच रही हूँ कि क्या इस लॉक डाउन के बाद हम कुछ संवेदनशील हो सकेंगे ? क्या हम उन ‘कुछ लोगों’ का दर्द भी समझ सकेंगे जो सालोंसाल से ‘लॉक डाउन’ में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं ? उन औरतों की तकलीफ़ महसूस कर सकेंगे जो सामान्य दिनों में भी लॉक डाउन रहने को विवश होती हैं, वो भी जीवन भर के लिए ? मैं सोच में डूबी हूँ. 

लॉक डाउन का नौवां दिन है. 


उम्मीद है आज से तेरहवें दिन ये बंदिशें (सम्भवतः) हट जायेंगी. फिर हम पहले की ही तरह सड़कों पर चीखते-चिल्लाते टूट पड़ेंगे. अपनी-अपनी रफ़्तार में दौड़ पड़ेंगे.

लेकिन क्या हम पहले से अधिक ‘मनुष्य’ भी हो पायेंगे ??


मंगलवार, 31 मार्च 2020

सकारात्मक ऊर्जा और उत्कट जिजीविषा से साक्षात्कार !

जानी - मानी लेखिका और रंगकर्मी श्रीमती विभा रानी के जन्मदिन पर कवयित्री सरोज सिंह ने अपनी फ़ेसबुक वाल पर उनके लिए यह post लिखी. उनकी अनुमति से इसे 'स्वयंसिद्धा' के मंच से शेयर कर रही हूँ. आप भी पढ़ें.

तुम्हारे माथे पे वो महज़ बिंदी नहीं बल्कि प्रतिष्ठित है सूर्य जिसकी चमक से और भी दमक उठता है तुम्हारा ओजमय स्वरुप, गाँव के आँगन ओसारे में जहाँ पुरखिनों के गीत व सोहर गुलज़ार थे कभी, जिन्हें कागज़ दवात नसीब न हुए दब गए उनके राग आँगन के लेपन में सिल दिए गए कई विरह गीत चउपता के पेवन में, कई तो झउन्स गए चुहानी में, ठीक उनके अरमानो की तरह. आज के दौर में सहल नहीं था उनके गीतों को खोजकर सहेज पाना तुम उन पुरखिनों की आवाज़ बन गयी लोक की बिसरी गाथाओं को समेटा ताकि लोक का राग,रंग,रस बचा रहे अज़ल तक तभी तो........ माटी की सोंधी गंध आती है तुमसे कंक्रीट होती माटी को उर्वर बनाने में तुमने कोई कसर नहीं रख छोड़ी है. अरे तुमने तो यमराज को भी चुनौती दे डाली मौत के भय पर विजय प्रेरणा देती है हम सभी को. तुमसे मिलकर लगता है कि ऊर्जा की गंगा में डुबकी लगा ली हो हर क्षण कुछ नया कुछ बेहतर कर गुजरने का जूनून कर देता है. तुम्हारा कद और ऊँचा. मासूम बच्चों सी तुम्हारी हंसी उम्र की रेत घड़ी को देती है पलट....बुढ़ापे को बेझिझक कह देती हो 'चल परे हट .......'मेरी दिल से यही आरज़ू है के यूँ ही तुम सदा रहो जवां खुशमिजज़ी रहे रवां रवां !
या मैं यूँ कहूँ कि सखी विभा से मिलना महज़ महफ़िल से मिलना ही नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और उत्कट जिजीविषा से साक्षात्कार करना है । मेरी उनसे पहली मुलाकात २०१७ में दिल्ली अवितोको चैप्टर की कवि गोष्ठी में हुई थी ।उनसे मिलकर ये अहसास ही नहीं हुआ कि पहली बार मिल रही हूँ । इतनी सहज,सरल स्नेह से परिपूर्ण हैं कि कोई भी उनसे मिलकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता । यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी कि रूम थियेटर अवितोको से जुड़ने का अवसर मिला जिसके मार्फ़त सखी विभा जी को और जानने व बहुत कुछ सीखने को मिला । एक अरसे से मेरी जो एक खोज थी कि समाज के लिए निस्वार्थ भाव से सकारात्मक रूप से जमीनी तौर पर कुछ अलग कुछ ख़ास कर पाऊं वो खोज अवितोको के हवाले से पूरी हुई । उनका व्यक्तित्व ,परिधान ,व्यवहार, अभिनय उनकी कला एवं भाषा किस-किस की चर्चा करूँ ? इन सभी गुणों में पारंगत उन्हें विशिष्ट से अति विशिष्ट बनाती हैं ।
उनकी " समरथ~CAN " 'सेलेब्रेटिंग कैंसर' सीरीज से गुजरते हुए यह आभास होता है कि रेडियशन से झुलसती देह से कैंसर को मात देते हुए जीवन में सौंदर्य कैसे रचा जा सकता है।
ऐसी जिंदादिली पर किसको न रश्क आ जाए । मारक मर्ज़ व उम्र को ताक पर रख कर इन्होने जितना हुनर और हौसला पाया है मैं समझती हूँ कि मैं उसका 10% भी पा लूं तो बहुत है । ऐसी सखी के लिए दिल से यही नारा निकलता है "सखी जिंदाबाद" !!! हे सखी जन्मदिन तहरा खूब खूब मुबारक हो ।

जिनगी के कुल दुआ तहरा नावे
तू सलामत रहs क़यामत तक
अऊर क़यामत कब्बो ना आवे
सांच हो जाव सब आरजु तमन्ना अउर ख्वाब
चमकत रहे तहरा चेहरा पे नूर के आफताब
दुःख के परछाई भी कब्बो छूये ना पावे
तू सलामत रहs क़यामत तक अऊर क़यामत कब्बो ना आवे।।।

प्रस्तुति - सरोज सिंह (रचनाकार)

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

बहुत समृद्ध है हमारा "स्त्री रंगमंच" !


नाट्य लेखिका, सशक्त  अभिनेत्री और रंगकर्म के माध्यम से पूरे देश में एक अलग ही तरह की क्रांति लाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता  विभा रानी को कौन नहीं जानता ? विभा जी ने  मैथिली भाषा के तीन साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताओं हरिमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी और लिली रे की छह किताबों का मैथिली से हिंदी में अनुवाद किया है। साथ ही हिंदी रंगमंच को 'मैं कृष्णा कृष्ण की', 'एक नई मेनका', 'भिखारिन' के अलावा 'आओ तनिक प्रेम करें', 'दूसरा आदमी-दूसरी औरत', 'अगले जन्म  मोहे बिटिया न कीजो' और 'प्रेग्नेंट फादर' जैसे मौलिक पुरस्कृत नाटक देकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है. 



विभा दीदी को जितना मैं जानती हूँ, उनके काम और समग्र व्यक्तित्व पर पूरी की पूरी एक किताब लिखी जा सकती है लेकिन उनके जिस एक अभियान ने मुझे मन मस्तिष्क से लेकर आत्मा की गहराइयों तक प्रेरित  किया था, वह था विभिन्न जेलों में कैदियों के बीच जाकर  रंगकर्म के माध्यम से उनका मानसिक पुनर्वास करना, उन्हें अवसाद और प्रायश्चित से भरी गहरी पीड़ा से मुक्ति दिलाने का प्रयास करना. एक महिला रंगकर्मी होने के नाते यह निश्चित रूप से आसान नहीं था लेकिन विभा दी आसान कामों को हाथ में लेती ही नहीं. वह स्वभाव से ही चुनौती पसंद हैं.  ब्रेस्ट कैंसर जैसे भयानक राक्षस से लड़ने और इस मारक लड़ाई में जीतने वाली हमारी यह जीवट योद्धा कोरोनावायरस के चलते लागू हुए 'क्वॉरेंटाइन' समय में भी अपनी रचनात्मकता के माध्यम से लोगों में प्रेरणा का प्रसार करने में लगी हैं. 

वर्षो पूर्व ही फिल्म 'धधक' और टेली फिल्म 'चिट्ठी' में पर्दे पर अभिनय क्षमता का लोहा मनवाने वाली विभा रानी ने वर्ष 2019 में रिलीज़ हुई सैफ़  अली खान स्टारर फ़िल्म 'लाल कप्तान' में  सबसे ज्यादा चर्चित होने वाला किरदार अदा किया या यूँ कहें कि उनकी अभिनय से ही वो किरदार इतना चर्चित हो गया. 

फ़िलहाल उनका यूट्यूब चैनल "बोले विभा" बहुत चर्चित हो रहा है जिसमें वह नित नए विषय के साथ दर्शकों से रूबरू होती हैं उनमें जीवन के प्रति राग-अनुराग और प्यार भरती हैं. आशा और नए सपनों की किरण जगाती हैं.


अनेकानेक नाटक लिखने वाली, अनेकानेक किरदार जीने वाली और एकल महिला नाटकों को सबसे ज्यादा प्रसारित करने वाली देश की वरिष्ठ रंगकर्मी विभा रानी के सबसे बेहतरीन योगदानों में से एक है -  "एक बेहतर विश्व - कल के लिए - अवितोको रूम थिएटर" अभियान, जिसके अंतर्गत उन्होंने रूम थिएटर की परिकल्पना को एक नया आयाम दिया है. नाटक करने वालों के स्वप्न को नया पंख, नया आकाश दिया है. नाटक कहीं भी हो सकता है. सीमित से सीमित संसाधन में 'अभिनय' के साथ रंगकर्म किया जा सकता है. अगर दर्शक नाटक तक ना पहुंचें तो नाटकों को दर्शक तक पहुंचाया जा सकता है. इस असंभव को संभव बनाने में विभा रानी का बहुत बड़ा योगदान है. मायानगरी मुंबई में आज रूम थिएटर और छोटे कक्षों में किए जाने वाले तमाम रचनात्मक कार्यक्रमों का जो सिलसिला चल रहा है, उसकी शुरुआत करने का श्रेय विभा रानी को जाता है , यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी.

विगत चार दशकों से निरंतर रंगकर्म और लेखन में संलग्न  और पिछले साल ही कार्यालयीय सेवा से निवृत हो कर पूर्ण रूप से रचनाकर्म को समर्पित हो जाने वाली विभा रानी अभी संतुष्ट नहीं हुई हैं.  उनका मानना है कि मंज़िल अभी दूर है. उनके ही शब्दों में "महिला रंगमंच पर अभी भी बहुत काम करना बाकी है. हर भाषा, हर समाज में अभी भी ऐसे लोग हैं जो रंगमंच को सही नहीं मानते. सम्माननीय नहीं मानते इसलिए उन जगहों पर अपने घर की बहू बेटियों, बीवियों का काम करना पसंद नहीं करते. महिला नाट्य लेखन हो रहा है लेकिन मुख्य रूप से उन्हीं के द्वारा जो नाटक से जुड़े हुए हैं. आज भी नाट्य लेखन को साहित्य का अंक हिंदी में कम से कम नहीं माना जा रहा है. इस कारण भी महिलाएं नाट्य लेखन में कम उत्सुक होती हैं नाटक लिखने के बजाय वह उपन्यास लिखना पसंद करती हैं क्योंकि इसकी मांग अधिक है." 
उम्मीद पर दुनिया कायम है और प्रयासों से ही नए निर्माण होते आये हैं. इस दृष्टि से प्रख्यात 'महिला' रंगकर्मी के रूप में विभा रानी जी का यह सतत प्रयास रंगकर्म में रत असंख्य महिला कर्मियों के लिए दिशा निर्देशक की भूमिका निभाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं.

प्रस्तुति - प्रतिमा सिन्हा (लेखिका)

गुरुवार, 26 मार्च 2020

"पढ़ी-लिखी जागरूक स्त्री ही सशक्त है।" - ममता कालिया

अपने उपन्यास 'दुक्खम सुक्खम' के लिए प्रतिष्ठित 'व्यास सम्मान' से अलंकृत सुविख्यात, सुप्रतिष्ठित कथाकार एवं मेरी प्रिय रचनाकार आदरणीया श्रीमती ममता कालिया जी का लेखन संसार बेहद विशाल है.
कुछ-कुछ अनंत आकाश सा.....



मैं और मेरे जैसी जाने कितनी ही महिला रचनाकारों ने उनको अपना आदर्श माना होगा, यह वो ख़ुद भी नहीं जानती होंगी. अपने जीवन की पहली लम्बी कहानी जो मैंने पढ़ी थी वो उनकी ही लिखी हुई थी. एक पूरा युग बिता कर पिछले साल दिसम्बर में उनसे मुलाक़ात हुई. उन्हें बिलकुल वैसा ही पाया जैसा सोचा था. ममतामयी, अपनत्व से भरी हुई. जब उनसे संकोच के साथ "स्वयंसिद्धा" हेतु उनके कुछ शब्द माँगे तो उन्होंने तुरन्त मेरे संकोच का मान रखते हुए अपनी सहमति दे दी.  
'स्वयंसिद्धा' ने उनसे तीन बातें जाननी चाही थीं.
*आपके विचार से सशक्त नारी कौन है
*आप स्वयं अपने आप पर किस एक बात के लिए गौरव महसूस करती हैं
*आपके जीवन का कोई एक ऐसा क्षण जब आपने अपने  या किसी दूसरे के हित के लिएसचमुच शक्ति प्रयोग किया हो।

पढ़िए कि मेरी प्रिय रचनाकार ने बिना किसी बनावट और लागलपेट के क्या कहा....... 



"कितनी अच्छी बात है कि इक्कीसवीं सदी में स्त्री को अपनी शक्ति दिखाने के लिए तीर कमान लेकर नहीं निकलना पड़ता।  बिना इतिहास में जाये, यह कहना पर्याप्त होगा कि आज पढ़ी-लिखी जागरूक स्त्री ही सशक्त है। सबसे ज़रूरी है कि वह अपने को शिक्षित करे। उसके बाद अपने किसी रोजगार से लगे। दूसरी बात, वह अपनी निर्णय क्षमता का विकास करे। कोशिश करे कि कार्यक्षेत्र में किसी हिंसा की चपेट में ना आए। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि वह स्वयं शोषक की भूमिका में आ जाए। उसके अंदर स्त्रियोचित सौम्यता, सरलता और लचीलापन भी बना रहे अन्यथा परिवार नष्ट हो जाएगा।
"गर्व नहीं संतोष कर सकती हूँ कि अनेक मुसीबतों, बेवकूफियों और बेइज्जतियों से अपने घर परिवार को बचाकर एक रचनात्मक जीवन जिया। बच्चों का कैरियर बन गया।रवींद्र भी मनचाहा लिख पाए,मनमाना जी पाए। मैंने भी किसी भी हाल में लिखना नहीं छोड़ा। परिवार को दीनता और पलायन, हीनता और पराजय से बचा सकी, इसका ही संतोष या गर्व समझ लो।" 
*
"छोटे-छोटे युद्ध लड़े और जीते। कॉलेज को कच्चे से पक्का कराने का संघर्ष 17 साल चला। एक लद्धड़ संस्था को पटरी पर लाने में जीवन की आधी ताकत खर्च हुई। संतोष यह कि जीत हासिल हुई। अपना लेखन तो किया ही बहुत सी लड़कियों को साहित्य में रुचि देने का काम किया। रवि के दिवंगत होने के बाद अकेले रहने का पराक्रम तो चल ही रहा है अभी। यहाँ बसने के साथ रचने का भी सुख है।"

- ममता कालिया

सोमवार, 23 मार्च 2020

सलाम सीमा कुशवाहा !

ये हमारी नयी हीरो हैं.

अगर आप नहीं होतीं तो हमारी निर्भया को इंसाफ़ शायद ही मिल पाता. बिना एक भी रूपये फ़ीस लिए जिस तरह से आपने आशा देवी का केस लड़ा वो बेमिसाल उदाहरण है. आप जैसे वकीलों ने ही न्याय व्यवस्था की नींव थाम रखी है.

हम आपको सैल्यूट करते हैं एडवोकेट सीमा कुशवाहा.

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

एक पुरानी बात......




जाने क्यों आज रोने को जी चाह रहा है ,
जाने क्यों भरी चली जा रहीं हैं पलकें,सुधियों की भीड़ से ,
जाने क्यों हर बात आज जैसे छू रही है मन ,
क्या है जो....
घुमड़ रहा है भीतर,
क्या है जो....
छूट रहा है बाहर ,
न जाने किसकी अनुपस्थिति ने पोंछ डाले हैं 
आसमान के सारे चटकीले रंग,
ये किसके न होने से 
सादी - वीरान सी हो गयी है हर दिशा,
ये किसका चेहरा बन कर धुंआ
छाया चला जा रहा है आँखों के आगे......? 
ये कौन है 
जिसका न होना............
 बाकी हर किसी के होने पर भारी पड़ गया है...? 


शुक्रवार, 9 मार्च 2012

उम्मीद की धूप ... !


कुछ दिनों से सोच रही हूँ ......
फिर कोई नज़्म लिखूं...

और अल्फाज़ की डोर में पिरो कर
 तुम्हारे तसव्वुर  को 
रख दूँ सादे पन्ने के दामन में
कुछ दिनों से सोच रही हूँ ......
उदास रातें कात कर धागे बनाऊँ 
और फिर उन  धागों से
बुन कर  कुछ ख्व़ाब,
सजा दूँ
 तुम्हारे ख़्याल के सुरमई रंगों से...

कुछ दिनों से सोच रही हूँ
कि पुराने स्वेटर सी कुछ यादें ,
मन की तहों से निकालूँ और 
एक बार फिर से उन्हें दिखा दूँ,
तुमसे  मिल पाने की
उम्मीद की धूप ... !!!

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...