माटी में बीज सा ख़ुद को बोना, बरखा सा ख़ुद ही बरसना, फिर उगना ख़ुद ही जंगली फूल सा. कांटना-छांटना-तराशना-गढ़ना ख़ुद को आसान नहीं होता. सिद्धि प्राप्त करनी होती है ख़ुद तक पहुँचने के लिए. धार के विपरीत बहना पड़ता है थकान से भरी देह उठाये तय करना पड़ता है रास्ता बिलकुल अकेले. दूसरों पर जय पाने से पहले ख़ुद को जय करना (जीतना) होता है...तब बनता है कोई "स्वयंसिद्ध" !!
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अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !
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1 टिप्पणी:
वाकई हमारी हीरो है , एक शातिर वकील से जंग जीतना आसान नहीं था । मालूम है ये मेरा अधूरा सपना है - मैं वकील ही बनना चाहती थी।
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