शनिवार, 24 अप्रैल 2010

क्या सचमुच गुम जाएगी पाती ...?

अब भी अच्छी तरह याद हैं बचपन के वो दिनकोमल सपनों के मन की डाल पर फरने के दिनसब कुछ कितना सुन्दर थावो हर रिश्ता, हर नाम , हर चीज़ , जो मन के पास थी , आस-पास थी , मानों ज़िन्दगी का ही हिस्सा थीजैसे उनके ही दम पर जीवन चल रहा होउनके बगैर भी जीवन है ये सोचना भी असंभव थाउनमें से ही एक था मोहल्ले का डाकिया और उसकी लाई हुयी चिट्ठियाँ । इंतज़ार के वो भी क्या हसीं पल थे । नानी की , मासी की ,सबसे बढ कर दोस्तों की चिट्ठियाँ , जो रहते तो अपने ही शहर में थे लेकिन उनसे भी बात करने लिए नीले अंतर्देशीय और पीले पोस्टकार्ड का सहारा लेना बेहद आत्मीय और सहज लगता था । अब की तरह घंटों मोबाइल से चिपके रहने का तो सवाल ही नहीं था ,क्योंकि मोबाइल ही नहीं था । तब स्कूल से लौट कर माँ से पूछना - '' कोई चिट्ठी आई क्या ?'' और जवाब में ' नहीं ' मिलने पर धूप वाली खड़ी दोपहरी में दरवाज़े पर जा कर डाकिये की राह देखना .... , क्या आनंद था उसमें , ये व्यक्त करना शब्दों के बस का नहीं । चिट्ठी में क्या लिखा है , उसका सुख तो पढ़ कर मिलता , लेकिन लिफाफे को छूने का सुख उससे कहीं बढ कर होता , मानों लिखने वाले के हाथ की खुशबू सीधे हम तक आ पंहुची हो । कॉलेज तक ये सिलसिला चलता रहा । फिर मानों समय ने अपनी जादुई झाड़ू फेरी हो , सालों कैसे बीत गए ,पता ही नहीं चला । सब कुछ बदलता रहा और पिछले पांच - छः सालों में तो इस बदलाव की गति कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गयी । इस गति के बहाव में सबके साथ हम भी बहे इसलिए कुछ बदलता सा महसूस नहीं हुआ , लेकिन कल अचानक बहुत दिनों बाद मोबाइल पर विविध भारती सुन रही थी । फरमाईशी गानों का कार्यक्रम चल रहा था और फरमाईशें थीं एस ० एम० एस ० के ज़रिये । बेशक अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप विविध - भारती पर बज रहे गाने बहुत कर्णप्रिय थे लेकिन मेरे मन की किसी सतह पर कहीं और कुछ और ही याद बज रही थी । याद आ रहे थे आकाशवाणी के वो दिन , फरमाईशी प्रोग्राम के लिए आने वाली चिट्ठियों के वो ढेर के ढेर और हमारा घंटों वो पत्र छांटना ... । एक ही श्रोता परिवार के बीसियों पोस्टकार्ड देखना और कहना - '' हे भगवान ! कैसे दीवाने लोग हैं ? पता नहीं इतना टाइम कैसे निकाल लेते हैं ? '' और सच कहूं फरमाईशों के एस ० एम ० एस ० के बीच मुझे अचानक ही वो दीवाने लोग बेहद याद आने लगे । ... तो विविध - भारती से भी चिट्ठियाँ गयी ? हम तो पहले ही आधुनिकता की दुहाई दे कर एक क्लिक पर बात कह डालना सीख चुके थे । अब कोई दीवानगी में डूब कर किसी को पाती पर पाती नहीं भेजा करेगा । किसी के पास समय नहीं। न लिखने का, न पढने का । शार्ट मैसेजेज़ और मेल्स का ज़माना है और यही शायद अब हमारी ज़रुरत भी । वैसे तो इस पूरे किस्से में बदलने वालों में हमारा भी नाम आता है लेकिन जाने क्यों मन में हूक सी उठी । कार्यक्रम के स्वरुप में ये बदलाव निश्चित रूप समय के साथ कदम से कदम मिलाने के लिए किया गया है लेकिन ये बदलाव मन को सोचने पर मजबूर कर गया । अब क्या सचमुच गुम जाएगी पाती ? और शायद साथ ही साथ गुम जायेगे पाती लिखने वाले और पाती पा कर उसमें लिखने वाले किसी अपने के हाथों की खुशबू खोजने वाले दीवाने लोग ... !

गुरुवार, 25 मार्च 2010

बंद करो ये इमोशनल अत्याचार !



इन दिनों मैं बहुत परेशान हूँदिन भर के काम की थकान के बाद जिन चीज़ों से मन बहलाती थी उनका बड़ा बुरा हाल हो गया हैसबके चेहरे बदल गए हैं , नाम गुम गए हैंसब अपना रास्ता ही भूल गए हैंमैं बात कर रही हूँ किसी समय में अपने फेवरेट (?) रहे उन धारावाहिकों की , जिन्हें देखना तो दूर सोचने भर से दिमाग हिलने सा लगता हैवो तब की बात थी और ये अब की बात हैतकरीबन दो साल हुए होगें , सास बहु के अझेल हो चुके प्रपंच रुपी धारावाहिकों की भीड़ में ठंडी पुरवाई सी आई थी हमारी आनंदी, बालिका - वधुशाये-शाये के भयानक इफेक्ट्स और भयावह साजिशों के जाल में उलझे मन ने ईश्वर का लाख धन्यवाद दिया था कि कम से कम अब प्राइम टाइम के हारर से छुटकारा मिलेगा और शांत मन से मनोरंजन हो सकेगासाथ ही साथ दिल ने लाख - लाख दुआएं दी थी उस भले मानस को , जिसने टी आर पी के अंधे शोर के बीच बाल विवाह जैसे अति संवेदनशील मुद्दे पर धारावाहिक बनाने का जोखिम भरा साहस दिखाया। बात में दम था । छोटी सी आनंदी ने रातों रात साजिशों का व्यूह भेदन करते हुए न सिर्फ सिर दर्द बन गयी बड़ी बहुओं को बाहर का रास्ता दिखाया बल्कि मनोरंजन के साथ शिक्षा और जागरूकता का संगम कर टेलीविज़न की दुनिया में क्रांति ला दी । आनंदी की नन्ही , मासूम अदाओं पर दिल फ़िदा हुआ और तभी इच्छा और तपस्या नाम की दो मासूम कलियों ने उतरन के ज़रिये मन मोह लिया । गरीबी - अमीरी की दीवार तोड़ते हुए निःस्वार्थ दोस्ती निभाती ये दो बच्चियां हरदिलअज़ीज़ बन गयी । कम से कम मैं तो इन तीनों बच्चियों की दीवानी रही ही । समय बीतता रहा जीवन के साथ धारावाहिक की कहानी भी आगे बढती रही । कभी - कभी मन सशंकित होता ज़रूर कि कही टी आर पी की आग में ये तीनों भी झुलस न जाये । फिर लगता .... अरे नहीं , इतने सधे हुए गंभीर विषय के भटकने की गुंजाइश ही कहाँ होगी ? लेकिन जय हो , उनकी जो बाज़ार की नब्ज़ पकड़ना जानते हैं (या जानने का मुगालता पाले हुए हैं)। देखते ही देखते इन दोनों धारावाहिकों की शक्ल ऐसी बदली कि अब तो पूरी डरावनी की श्रेणी में आ गए हैं । जिस स्टोरी लाइन को लेकर बात शुरू हुयी थी वो स्टोरी कहाँ गयी , ये एक बड़ा रहस्य है । बाल विवाह की सारी समस्याएं खानदानी दुश्मनी ,अविश्वसनीय चमत्कारनुमा घटनाक्रम और महाबोरिंग रोने - धोने में ऐसी खोयीं कि देखने वाले सिर धुनते रह गए। हर एपिसोड के अंत में आने वाला ब्रम्ह वचन भी असर छोड़ कर ऊटपटांग की श्रेणी में जा पहुंचा । मोरल ऑफ़ द स्टोरी ये रहा कि आप आराम से छोटी बच्चियों के विवाह कीजिये , हम उम्र से या दुगनी उम्र वाले से , कुछ समय बाद खानदानी दुश्मनी की खुरपेंच में फंसने और एक दो बच्चे पैदा करने के बाद सब की सब लाइन पर आ जायेगीं और आप आराम से कह सकेगें 'आल इज वेल '। दूसरी तरफ का हाल भी कुछ ज्यादा अलग नहीं । अगर आप अमीरी - गरीबी की सीमाएं तोड़ कर दोस्ती हो जाने के फलसफे में यकीन करते हैं तो उतरन देखिये और अपने मुगालते से बाहर आईये । अगर आप गरीब है और अपनी औकात भूल कर पैसे वाले से दोस्ती करना चाहते हैं तो याद रखिये , कुछ सालों बाद आपका वही अज़ीज़ दोस्त अपनी साजिशों से आपका वो बुरा हाल करेगा कि आप दोस्ती क्या अपना नाम भी भूल जायेगें , बिलकुल इच्छा की तरह । इन दोनों सीरियल्स का जो कबाड़ा खुद इनके ही निर्माता - निर्देशक -लेखक द्वारा किया गया है , उसे देख कर रोना भी नहीं आ पाता। शायद ये सब बेचारे सिरे से भूल गए हैं कि उन्होंने अपना धारावाहिक किस कहानी को लेकर शुरू किया था और उस कहानी का मकसद क्या था ।या फिर शायद इन्हें अपने दर्शकों की बेवकूफी पर पूरा भरोसा है और ये सोचते हैं कि इनकी हर बेसिरपैर की प्रस्तुति पर हम दर्शक इनकी प्रशंसा के लिए बाध्य हैं । मैं किसी भी तरह विशेष कर इन दोनों धारावाहिकों के (क्योकि दुर्भाग्य से मैं इन्हें देखती हूँ ) नीति निर्माताओं तक अपनी ये गुहार पहुँचाना चाहती हूँ कि कृपा कर दर्शकों पर ये इमोशनल अत्याचार करना बंद करें । कहानी अगर आगे नहीं बढ सकती तो भगवान के लिए उसे ख़त्म कर दें , खींच - खींच कर हमारा बीपी न बढाए। हमारे दिमाग का दही करने के लिए ज़िन्दगी में और भी ढेरों दूसरे साधन (!) मौजूद हैं , आप कृपया कष्ट न उठायें । अभी जब आनंदी माथे के बीचों बीच गोली खा कर मरने के बजाये कोमा में चली गयी तो सच मानिये हम बहुत हँसे (क्या करें , रोना तो चाह कर भी नहीं आया) और खुद से शर्त भी लगा ली कि ये बच जाएगी और शर्त जीत भी गए , लेकिन सच मानिये मज़ा नहीं आया। अरे, बचाना ही था तो गोली हाथ - पाँव कही भी मरवा देते ।, सीधे दिमाग को निशाना लगाने की क्या ज़रुरत थी । कहीं ऐसा तो नहीं कि आनंदी के बहाने आप दर्शकों का दिमाग ब्लास्ट करना चाहते हैं । लेकिन अब ऐसा होना कुछ मुश्किल है । वो दिन हवा हुए जब मिहिर के मरने और तुलसी के जेल जाने पर हमारे साथ पूरा देश रोया करता था । अब हमें बेवक़ूफ़ बनाना उतना आसान नहीं रहा । अब हम थोड़े समझदार हो गएँ हैं ,इसीलिए ये गुज़ारिश कर रहें हैं कि ये इमोशनल अत्याचार बंद नहीं हुआ तो हम सीरियल्स देखना ही बंद कर देगें ।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

लायी है हज़ारों रंग होली !

होली का मतलब चहुँ ओर रंग ही रंग ! प्यार का , दोस्ती का , स्नेह का , अमनोशांति का , सौहार्द का , मेल - मिलाप का रंग । ऐसा रंग जो सबको एक ही रंग में सराबोर कर दे । सच ..., मन सारी दुश्वारियों के बावजूद हरबार कुछ ऐसी ही कल्पना , ऐसी ही ख्वाहिश करता है कि काश यही सारे रंग न सिर्फ मुझे बल्कि मेरे सारे मुल्क को , सारी दुनिया को रंग दे और ऐसे रंग दे कि रंग नाही छूटे। मगर इन सारी सुन्दर और रंगीन कल्पनाओं के बीच मन कभी - कभी उदास भी हो जाता है । कैसे होगें वो लोग , जिन्होंने बीते वक्त में , गुज़ारे साल में अपने कुछ लोग खो दिए होगें ? जिन पर कुछ ऐसी दुःख - तकलीफ आ पड़ी होगी जिसे उम्र भर भुलाया नहीं जा सकता होगा । जिनकी ज़िन्दगी के हर रंग में एक काला, सियाह रंग घुल गया होगा । वो क्या कर रहे होगे अबकी होली में ? हो सकता है मैं इनमें से कुछ को जानती हूँ ,कुछ को नहीं जानती हूँ , हो सकता है मैं इन सबसे जीवन में कभी न मिलूँ , मगर फिर भी जाने क्यों मन उन सबको याद कर रहा है । सच है दुःख - सुख की सबकी अपनी -अपनी परिभाषा होती है । पिछले गुज़ारे वक्त में हुए हादसों , दुर्घटनाओं के शिकार हुए लोगों की ज़िन्दगी में फिर से जीने के रंग खिलने की दुआ के साथ मैं बस एक उम्मीद करना चाहती हूँ कि कोई भी ग़म कभी इतना बड़ा न हो कि ख़ुशी उसके आगे अपना हौसला खो दे , कोई भी अँधेरा इतना बड़ा न हो कि रौशनी उसके आगे अपने ताकत खो दे। ज़िन्दगी हर हाल में ज़िन्दगी रहे । धड़कनों से भरपूर , उम्मीद के रंगों से भरी हुयी ।

प्रतिमा !!!

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कई बार यूं भी देखा है ....


ज़िन्दगी के लिए यूं तो न जाने कितने फ़लसफ़े लिखे-कहे,समझे - समझाए गए हैं । लेकिन जब बात खुद की हो तो हमेशा ही एक उलझन घेर कर खड़ीहो जाती है । अक्सर मैं ज़िन्दगी को अपने समानांतर चलते हुए पाती हूँ । लेकिन हैरानी की बात ये कि मेरे समानांतर चलते हुए भी ये मेरे कदम से कदम या मेरी रफ़्तार से रफ़्तार नहीं मिलाती , बल्कि आगे पीछे ,दायें - बाएं , कभी तेज़ तो कभी धीमी चाल से चलती रहती है। चाहती तो मैं पूरे मन से हूँ कि हम दोनों की चाल एक रहे लेकिन वो भी चाहे तब तो ..... । कभी दूर से मुझे जलाते हुए इशारे करती है जैसे कह रही हो , देखो मैं कितनी खुश हूँ , छू सको तो छू लो मुझे , और ये तब होता है जब मैं अपने किसी बहुत ज़रूर काम में उलझी होती हूँ । उस वक्त चाह कर भी ज़िन्दगी को छू नहीं पाती। और कभी यूं भी होता है कि मैं अपने किसी बहुत अज़ीज़ , खुशगवार लम्हे में ग़ुम होकर एक - एक कतरा ख़ुशी पीने के लिए मचल रही होती हूँ कि तभी एक उदास सदा दे कर ज़िन्दगी पुकार लेती है मुझे , तब मैं चाह कर भी वो ख़ुशी भरे लम्हे जीभर के जी नहीं पाती और ज़िन्दगी की उदासियों में मन मार कर शरीक होना पड़ता है मुझे । है न अजीब बात ...... । क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मेरी अपनी ज़िन्दगी मेरी हमकदम हो कर चले और मैं हर लम्हा सही मायनों में जी सकूं ...... , क्योंकि सांस लेना ही तो जीना नहीं होता ....... !

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

ऑळ इज़ वेल ...!

हर तरफ चर्चा है , ऑळ इज़ वेल । जब दिल सचमुच परेशान हो , कोई हल न सूझ रहा हो और बिला वजह का टेंशन दिमाग में घुसने की कोशिश में लगा हुआ हो , उस वक्त ये कहना वाकई बहुत तसल्ली देता है कि ऑळ इज़ वेल । अब ये बात दूसरी है कि सब कुछ वाकई वेल हो भी, ये कतई ज़रूरी नहीं । बस ये मान लेना होता है कि सब ठीक -ठाक है फिर तनाव कुछ ही देर के लिए सही भाग तो जाता ही है । सच कहा है गुलज़ार साहब ने - दिल तो बच्चा है जी , बात -बेबात यूहीं उछला , मचला , बहका करता है । बात परेशानी की हो या न हो जब ज़िद पर आ जाये तो परेशान हुए बिना मान नहीं सकता । खुद तो उलझेगा ,साथ ही दिमाग को भी उलझा देगा । फिर हो गयी मिनटों - घंटों की नहीं , दिनों की छुट्टी । कहीं ,किसी काम में मन नहीं लगेगा , कभी न घटने वाली किसी अनहोनी की आशंका जीना मुश्किल कर देगी और हर घड़ी बस यही एहसास कचोटता रहेगा कि अपने साथ सब कुछ बुरा ही बुरा हो रहा है । और फिर वो सारा वक्त काटना इस कदर मुश्किल हो जायेगा जिसका बयान मुश्किल है । दूसरों का नहीं जानती लेकिन मेरे साथ अक्सर ऐसा हो जाता है । संवेदनशीलता और अतिसंवेदनशीलता में शायद सिर्फ एक मनोरोग का ही अंतर है जिसका शिकार कभी -कभी मैं न चाहते हुए भी हो जाती हूँ । मगर जब से ऑळ इज़ वेल का गुरुमंत्र पाया है (थैंक्स टू थ्री ईडियट्स ) तब से इस बच्चे को बहलाना सीख गयी हूँ । जहां भी , जब भी किसी गड़बड़ की आशंका हुई नहीं कि तुरंत इससे कहती हूँ - चुप हो जा बच्चे , ऑळ इज़ वेल । अब ये नहीं कह सकती कि ये बच्चा इस मन्त्र की शक्ति को कितना स्वीकारता है ( क्योंकि इसकी उछल - कूद जारी रहती है) , लेकिन इतना ज़रूर है कि इन तीन अल्फ़ाज़ ने उस यकीन को कुछ और पुख्ता कर दिया है कि सुख - दुःख दरअसल मन की ही स्थितियां हैं । ये मन जैसा चाहता है , बाहर की दुनिया , लोग, हालात वैसे ही लगने लगते है ।

रविवार, 24 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस की बधाईयाँ


आने वाले मंगलवार को 'हम भारत के लोग' अपने महान गणतंत्र की साठवीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं । साठ वर्ष पहले छब्बीस जनवरी को हमने अपना संविधान आत्मार्पित किया था । वो संविधान , जो हमें पूर्ण स्वतंत्रता , समानता , न्याय और सम्मान के साथ एक प्रतिष्ठित और गरिमामय नागरिक के रूप में स्वयं को स्थापित करने का अवसर और वातावरण प्रदान करता है । वो संविधान , जो भारत जैसे विशाल देश को एक विधान - सूत्र में पिरोते हुए , एक छोर से दूसरे छोर तक अखंड , अविभाज्य और अतुल्य बनता है । बचपन से ही गणतंत्र दिवस को लेकर मन - मस्तिष्क में एक अनोखा उत्साह रहता आया है । सुबह से ही उमंग की लहरें पूरे तन -मन को उद्वेलित करती रहती हैं । दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर राजपथ दिल्ली की भव्य परेड का सजीव प्रसारण , लाल किले पर शान से फहराता हमारी जान तिरंगा और विश्व भर के समक्ष अपने अदम्य शौर्य और पराक्रम का जयघोष करती भारतीय सेना ... ।जोश का समंदर अपने पूरे उफान पर रहता है । एक नहीं , हजारो , लाखो , करोड़ों बार ऊपर वाले को धन्यवाद देती हूँ कि उसने मुझे इस पुण्य धरा की माटी में जन्म लेने का अवसर दिया और ये कोई कविता या शेर ओ शायरी की भाषा नहीं सच्चे मन की अभिव्यक्ति है । मुझे अपने देश से बेइंतहा प्यार है । मैं इसके खिलाफ कुछ कहना तो दूर , कुछ सुन भी नहीं सकती । मैं इसकी रूह से मोहब्बत करती हूँ और अगर पुनर्जन्म की परिकल्पना सही है तो बार - बार इसी भूमि पर जनमना चाहती हूँ ।
बावजूद इसके , इस दफ़ा मन जाने क्यों कुछ उदास सा हो रहा है । बचपन से ही इस दिन की पहचान रही मन की वो उमंग जाने कहाँ ग़ुम सी गयी लगती है । जाने क्यों लगता है जैसे बीतते सालो में सारा कुछ महज औपचारिकता बन कर रह गया है।२६ जनवरी का मतलब अब है , एक और छुट्टी , आराम का - मस्ती का दिन ।
छोटे -छोटे बच्चे ,जो भारत के भावी नागरिक हैं , कर्णधार हैं , उनके लिए भी गणतंत्र दिवस केलेंडर में छपी एक तारीख से ज्यादा कुछ नहीं , जब उनके सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं और मिठाईयां बंटती हैं ।
विश्व के महानतम गणतंत्र के ६१ वें वर्ष में प्रवेश करने के साथ ही हमें इस पहलू पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि कैसे इस महान गणतंत्र की संवैधानिक गरिमा की अमूल्य विरासत भावी पीढ़ी के कर्णधारों के हाथों तक पहुंचाई जाये , कि वे इसे धारण करने के योग्य बन सकें ।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

नया अहसास

हां , ये कहना ही पड़ेगा , कहना ही चाहिए । नया ही तो है सब कुछ । नया साल जो है । मगर सच कहू , मेरे इस कहने के पीछे एक खलिश भी है । जो बहुत पहले करना चाहिए था वो करने में थोड़ी देर हो गयी । नए साल की शुरुआत होने से पहले ही इतनी उथल -पुथल मच गयी कि फिर कुछ करने का न वक्त मिला , न मौका । नहीं - नहीं , कुछ ख़ास नहीं , अरे बाबा , मै किसी राजनैतिक या प्राकृतिक उथल - पुथल की बात नहीं कर रही हूँ ( हैती में भूकंप तो बाद में आया ) , मै तो उस उथल -पुथल की बात कर रही हूँ जो मेरे इर्द - गिर्द मची । कार्यालय का स्थान परिवर्तन हुया , सारा ऑफिस चंद कार्टून्स में पैक हो गया । फिर नए सिरे से 'दुकान' जमाने की चिंता । गए साल का आखरी और नए साल का पहला हफ्ता इन्ही सब पर कुर्बान हो गया। उसके बाद जब फिर से बैठने की नौबत आयी तो वो सारे काम एक -एक कर याद आने लगे जो इस आपाधापी में छूट गए थे और यकीन मानिये सबसे पहले जो ज़ेहन में आया वो था 'मेरा आकाश '। उन्नीस से उन्नीस , आज पूरा एक महीना हो गया । पिछली उन्नीस को पा देखी थी और कुछ लिखा था । इस एक महीने में बहुत कुछ हुआ , बस लिखने का संजोग नहीं बना । नए साल से रोज़ नियमित ब्लॉग लिखूगी , इस संकल्प की भी ऐसी की तैसी हो गयी। खैर चलिए , जब शुरू हो जाये , वही शुरुआत है । उम्मीद करती हूँ कि जब शुरुआत हो ही गयी है तो आगे भी सब अच्छा ही
होगा ।
मेरे सब अपनों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये !

प्रतिमा .......................

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...