सोमवार, 24 मई 2010

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है ?


आजकल मेरे शहर में प्रगति कार्य ज़ोरों पर है और चूंकि मेरे शहर में हर प्रगति कार्य की शुरुआत सड़क की खुदाई से होती है इसलिए अब आलम ये है कि शहर की लगभग सारी मुख्य सड़कें या तो खोदी जा चुकी हैं या फिर खोदी जाने वाली हैं । इस अनवरत और धुआंधार सड़क खुदाई के चलते मेरा शहर मैदानी से पहाड़ी और शहरी से ग्रामीण क्षेत्र में तब्दील हो चुका है । चूंकि प्रगति की बहुत जल्दी थी इसलिए ये व्यवस्था नहीं बनाई गयी कि एक काम पूरा हो जाने के बाद ही दूसरे काम में हाथ लगाया जाये और हर तरफ एक साथ ही काम शुरू हो गया । अब अगर घर से ऑफिस की दूरी घड़ी देख कर आधे घंटे की है तो बेहतर ये होगा कि घर से दो घंटे (बिना किसी अतिश्योक्ति के) पहले निकला जाए वरना टाइम पर पहुँचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । कारण --- हर मुख्य चौराहे और रास्ते पर बेतहाशा - बेतरतीब जाम । तेज़ धूप, चिलचिलाती गर्मी में घंटो जाम में फंसने का दर्द वही जानता है जिसने ये त्रासदी झेली हो । इस स्थिति का असर धीरे - धीरे ज़हर सा फैलता जा रहा है । पहले जहाँ रिक्शे और ऑटो वालों से झिक - झिक की नौबत कभी - कभार ही आती थी वहाँ अब शायद ही कोई दिन हो जब ऐसा न होता हो । लगता है सब पगला गए हैं । धूल - धूप - गर्मी - जाम और घंटों की फजीहत से बौखलाए लोग जैसे दिमागी संतुलन खोते से जा रहे हैं । एक तरह की मानसिक त्रासदी के शिकार होते जा रहे हैं सब के सब । दिमाग और शरीर की ऊर्जा सडकों पर खोने के बाद घर पहुँचने पर इतनी हिम्मत भी बाकी नहीं रहती कि सुकून के चन्द पल घरवालों के साथ बिताये जा सके । दिन भर दिलोज़ेहन में इकट्ठा तनाव और शोरगुल इस हालत में नहीं छोड़ता कि शाम के कुछ लम्हे चैन से गुज़ारे जाएँ ।

शनिवार, 8 मई 2010


केलेंडर बता रहे हैं कि नौ मई को मदर्स डे है । माँ का दिन ... । अपने बच्चे के ही लिए जीने वाली , उसकी ही आँखों से सोने - जागने वाली , उसके ही सपनों पर कुर्बान होने वाली माँ को एक प्यार भरा आभार देने का दिन ... । जिस माँ से बस लेते ही लेते रहते हैं , उस माँ को एक नन्हा मगर दुलार भरा उपहार देने का दिन .... । सब अपनी -अपनी माँ को उपहार देने और उसे खुश करने की योजना बनाने में व्यस्त हैं और मैं ...........................
मैं सोच रही हूँ कि क्या दूँ माँ को , जो उस तक पँहुच जाये क्योकि मेरी माँ तो अब वहाँ है , जहां शायद मेरी आवाज़ भी नहीं पँहुच सकती । एक अजब सा खालीपन महसूस कर रही हूँ जिसे बाँट पाना मुमकिन ही नहीं है । जब मैं छोटी थी तब ऐसे पर्व नहीं होते थे । अपनी माँ से बेपनाह मोहब्बत करने के बावजूद मैं उससे कभी नहीं कह सकी कि माँ मैं आपको बहुत प्यार करती हूँ । मैंने उसे कभी ये भी नहीं बताया कि उसके नहीं होने पर मेरी जिंदगी किस कदर अधूरी और ख़ाली हो जायेगी । मैंने अपनी माँ को कभी आभार भरा उपहार या सुन्दर संदेशों वाला कार्ड नहीं दिया । शायद हमेशा यही सोचा कि माँ तो सब जानती ही है , अगर नहीं जानती तो उसे जानना चाहिए ,आखिर वो माँ जो है । पता नहीं, माँ के रहते मैं कभी ये क्यों नहीं सोच पायी कि प्यार का एहसास कितना भी रूहानी सही मगर कभी - कभी शब्दों के माध्यम से उसकी अभिव्यक्ति भी अहमियत रखती है । कोई हमारे लिए कितना ज़रूरी है ये बताना कभी - कभी उसकी उम्र बढाने जैसा हो सकता है । मेरी माँ मेरे लिए कभी खुद से अलग इकाई नहीं रही । वो पहले भी मुझ में थी , आज भी है और तब तक रहेगी जब तक उसकी कोख में आकार लेने वाला मेरा शरीर ख़त्म नहीं हो जाता । लेकिन आज सोच रही हूँ तो लगता है कि हाँ मुझसे भूल हो गयी । मुझे माँ से कहना चाहिए था, वो सब कुछ, जो मैं कहना चाहती थी उससे । मुझे उसे बताना चाहिए था कि चाहे उसने मुझे अपने भीतर सिरजा हो , मगर मैं उसे अपने भीतर महसूस करती हूँ । मुझे माँ से कहना चाहिए था कि मेरे लिए सारी दुनिया में उससे ज्यादाख़ास, प्यारा और कीमती कोई न था, न होगा। मुझे माँ को बता देना चाहिए था कि ऊपर से चाहे मैं कितनी भी निश्चिन्त , निर्लिप्त दिखूं , लेकिन सच ये है कि उसके हर सुख - दुःख से मैं भीतर तक टूटती - जुड़ती, बनती - बिगड़ती हूँ । मुझे माँ को ये भरोसा भी ज़रूर दिलाना चाहिए था कि हालात ने ऊपर से भले ही मेरे रास्ते उससे अलग बना दिए हो मगर मेरा हर रास्ता उससे ही हो कर गुज़रता है । जिंदगी चाहे कितने भी रास्ते बदले मगर उसके ही लहू - अस्थि - मज्जा से बनी मैं उससे अलग नहीं होउगीं। हां...... मुझे माँ से ये सब कह देना चाहिए था,मगर मैंने नहीं कहा और आज ये एहसास मुझे बेतरह तकलीफ़ दे रहा है कि माँ ये सारा सच जाने बिना ही चली गयी । दुनिया की हर माँ को अपने बच्चे से ये सुनने का हक़ है कि वो उसके लिए कितनी ख़ास है और मेरी माँ को उसका ये हक़ नहीं मिल सका । आज दुकानें हृदयस्पर्शी संदेशों वाले कार्डों से सजी हैं मगर मैं चाहूं तो भी उन्हें खरीदकर माँ तक नहीं पहुँचा सकती । मैं गिफ़्ट की दुकानों पर माँ के लिए सजे उपहारों को देखती हूँ और उदास हो जाती हूँ । दिख रही चीज़ें अचानक धुंधला जाती हैं और एहसास होता है कि कुछ आंसू सा आ कर अटक गया है ।

शुक्रवार, 7 मई 2010

कुदरत तुझे सलाम !

सात मई की सुबह एक अलग ही अनुभव ले कर आयी । मैं सोच रही थी कि ये हंगामा सिर्फ मेरे शहर में ही बरपा मगर अगले दिन की ख़बरों से मालूम हुआ कि पूरा पूर्वांचल और हमारा पड़ोसी बिहार भी इसकी चपेट या कहें कि लपेट में था । सुबह साढ़े छः बजे उठी तो सब ठीक - ठाक था । रोज़ की तरह ... । लेकिन सात बजते - बजते '' दिन में रात हो गयी '' और फिर स्क्वाल (एक प्रकार का तूफ़ान ) नाम के बिन बुलाये अतिथि महोदय कुछ इस अंदाज़ में धमके कि मज़ा आ गया। बाद में मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से मालूम चला कि ये अतिथि महोदय दरअसल बिन बुलाये नहीं , बाकायदा निमंत्रित थे । ये बात दूसरी है कि ये निमंत्रण हमने नहीं , पिछले कुछ दिनों से लगातार बढ रही गर्मी और नमी के चलते खुद कुदरत का दिया हुआ था । तभी तो ये इतने बिंदास तरीके से आये , गरजे, बरसे और बस मिनटों में हंगामा मचा कर गए । सच कहती हूँ बहुत अद्भुत नज़ारा था । तेज़ हवाएं , मूसलाधार बारिश ,तूफ़ान में बौराए झूम कर दोहरे हो रहे पेड़ , हवा के तूफानी वेग से उखड़ कर यहाँ - वहाँ उड़ रहे - गिर रहे लोहे के बड़े - बड़े होर्डिंग्स , बिजली के खभे और पेड़ों के मोटे - मोटे तने । ये भी इत्तेफ़ाक था कि मैं ठीक उसी वक्त सुबह की ड्यूटी पर जाने के लिए रास्ते में थी शायद इसीलिए इस नज़ारे को और भी करीब से महसूस कर सकी । लगता था कि किसी भी वक्त कोई पेड़ या होर्डिंग उखड़ कर गाड़ी पर आ गिरेगा । ईश्वर की कृपा से मैं तो सुरक्षित गंतव्य तक पहुँच गयी लेकिन इस तूफ़ान ने कितना कहर ढाया ये तो अगले दिन के अखबार से पता चला ।उस बर्बादी का ब्यौरेवार वर्णन करना नहीं चाहती लेकिन ये ज़रूर सोच रही हूँ कि ............ सच कितनी ताकत होती है कुदरत में और जब वो ताकत जगती है तो हमारी सारी शक्ति , सारी ताकत पनाह मांगने लगती है । फिर भी कितने दुस्साहसी होते हैं हम इंसान भी , बार - बार कुदरत को छेड़ना नहीं छोड़ते । ज़रा सोचिये, इस छेड़- छाड़ से कुपित हो कर जिस दिन ये कुदरत अपने प्रकोप का तीसरा नेत्र खोल देगी, उस दिन हमारा क्या होगा ?

गुरुवार, 6 मई 2010

देर आया ,क्या दुरुस्त भी आयेगा ??????????/


वैसे तो संसार का हर धर्म दया , करुणा और क्षमा की शिक्षा देता है और विशेषकर हम भारतीय इस शिक्षा को सही अर्थो में आत्मसात भी करते रहे हैं ,मगर कभी - कभी अन्याय और अत्याचार उन हदों के पार चला जाता है जहाँ किसी भी नैतिक शिक्षा की कोई भूमिका नहीं रह जाती । वहाँ होता है सिर्फ क्रोध , तिलमिलाहट तीव्र आक्रोश और रगों में सुलगता लावा जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिशोध लेना और अत्याचारी को दंड देना चाहता है । २६/११ को भारत की अस्मिता पर हुए आतंकी हमले के बाद शायद हर भारतीय ने ही अपनी रगों में इसी लावे को पिघलता महसूस किया है । ऊपर से सितम ये कि अपनी - अपनी जगह रह कर - रुक कर सिवाय देखते रहने के कुछ किया भी नहीं जा सकता क्योकि दंड देना एक कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके अपने तरीके हैं, प्रावधान हैं , जिनमे समय लगता है , प्रतीक्षा करनी पड़ती है । शुक्र है कि प्रतीक्षा - काल बीता और छः मई , २०१० को वो फैसला आ ही गया जिस पर पूरे देश की नज़र टिकी थी । अजमल कसाब को अंततः सज़ा-ए-मौत का फ़र्मान सुना दिया गया ।ये वो शख्स है जिसकी बेरहमी ने ऐसा कहर बरपा किया था जिसमे न जाने कितनी जिंदगियां ख़त्म हो गयीं , कितनी बर्बाद हो गयीं और कितनी ही हमेशा - हमेशा के लिए जिंदा लाशों में तब्दील हो गयीं । एक ऐसा जुर्म , जिसके लिए रहम की सोचना भी गुनाह सरीखा है । अदालत ने मुजरिम को वही सज़ा दी , जिसका वो हकदार था ।फ़ैसला आने में वक्त लगा , मगर आया तो मन को ठंडक मिली । लेकिन .............
बात अभी खत्म पर नहीं पहुंची है । ये फैसला तो कुछ देर के लिए दर्द का एहसास भुला देने वाली दर्दनिवारक दवा की गोली जैसा है ,दर्द का पूरा इलाज नहीं और अब सवाल है यही कि क्या ....... दर्द का पूरा इलाज होगा ? कसाब की अंधी दरिंदगी ने जिन जिंदगियों को हमेशा के लिए अंधे कुएं में धकेल दिया , क्या...... उन्हें न्याय मिलेगा ?
क्या इस सज़ा के फ़ैसले पर अमल होगा ?
या फिर --------------------------------------------------- ???


सोमवार, 26 अप्रैल 2010

उसने कहा है ...

चर्चा है कि सोशल नेटवर्किंग साईट्स बड़े लोगों की नोक -झोक और लड़ाई का नया मैदान बन चुकी हैं । किसी को किसी के भी लिए कुछ भी कहना हो , शोले उगलने हों या फिर फूल बरसाने हों , आज की तारीख़ में सबसे अच्छा तरीका है , अपनी नेटवर्किंग साईट पर जाना और सारी भड़ास निकाल देना । यही वो माध्यम है जहां आपकी बात बिलकुल उसी प्रारूप में छप जाती है ,जैसा आप कहना चाहें । वो भी बिना किसी संपादन के ,सिर्फ एक क्लिक पर । अपने को अभिव्यक्त कर पाना सचमुच इतना आसान कभी नहीं था । मुझे लगता है इस विषय पर नकारात्मक दृष्टिकोण की बजाय सकारात्मक तरीके से रिएक्ट किया जाना चाहिए । आखिर बात चाहे जैसी क्यों न हो , पहुँच तो अपने मूल रूप में ही रही है और ये एक शुभ लक्षण कहा जा सकता है । ये स्थिति उन दिनों से तो अच्छी ही कही जाएगी जब सेलिब्रिटीज़ और आम लोगों के बीच में एक ख़ास जमात होती थी, जिन पर उन बड़े लोगो की बात को आम जनता तक पहुँचाने का जिम्मा हुआ करता था और जिनके हाथों में किसी भी बात को किसी भी हद तक तोड़मरोड़ कर अपने तरीके से पेश कर देने की विध्वंसकारी ताकत भी ... । कहा कुछ जाता था और लोगों तक पहुँचाया कुछ और जाता था । इस सबके पीछे अपने -अपने निहित स्वार्थों की भूमिका हुआ करती थी और बेचारा कहने वाला दिनों , महीनों , सालों तक सफाई देता फिरता था कि उसने ऐसा नहीं कहा या फिर उसके कहने का वो मलतब नहीं था । बेचारी जनता अलग ही कन्फ्यूज़न में पड़ी रहती थी कि किसे सही माने, किसे गलत । ये स्थिति अगर सौ फ़ीसदी सच नहीं तो पचास फ़ीसदी तो थी ही। समय बदला और समय के साथ हमारे कहने - सुनने के तरीके भी बदले । आज बात चाहे हमारे महानायक की हो , सुपर हीरो की हो , मनपसन्द खिलाडी की हो , या हो किसी विवादित हस्ती की , उनके ब्लॉग पर जाईये और जान लीजिये वो सब कुछ जो वो अपने पक्ष में आपसे कहना चाहते हैं । उन्हीं के भाव ,उन्हीं के विचार , उन्हीं के शब्दों में , बिना किसी दूसरे की मिलावट के . हाँ , बात में खुद कहने वाले ने सच - झूठ की कितनी मात्रा का इस्तेमाल किया है ये परखना आपके विवेक पर निर्भर करता है लेकिन कम से कम आप इतना निश्चिन्त तो हो ही सकते हैं कि जो कुछ आप पढ़ रहे है ये उसी की अभिव्यक्ति है , जिसके नाम पर आप पढ़ रहें हैं ।निश्चित रूप से अभिव्यक्ति की ये पारदर्शिता स्वागत और प्रशंसा के योग्य है ।
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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

क्या सचमुच गुम जाएगी पाती ...?

अब भी अच्छी तरह याद हैं बचपन के वो दिन । कोमल सपनों के मन की डाल पर फरने के दिन । सब कुछ कितना सुन्दर था । वो हर रिश्ता, हर नाम , हर चीज़ , जो मन के पास थी , आस-पास थी , मानों ज़िन्दगी का ही हिस्सा थी । जैसे उनके ही दम पर जीवन चल रहा हो । उनके बगैर भी जीवन है ये सोचना भी असंभव था । उनमें से ही एक था मोहल्ले का डाकिया और उसकी लाई हुयी चिट्ठियाँ । इंतज़ार के वो भी क्या हसीं पल थे । नानी की , मासी की ,सबसे बढ कर दोस्तों की चिट्ठियाँ , जो रहते तो अपने ही शहर में थे लेकिन उनसे भी बात करने लिए नीले अंतर्देशीय और पीले पोस्टकार्ड का सहारा लेना बेहद आत्मीय और सहज लगता था । अब की तरह घंटों मोबाइल से चिपके रहने का तो सवाल ही नहीं था ,क्योंकि मोबाइल ही नहीं था । तब स्कूल से लौट कर माँ से पूछना - '' कोई चिट्ठी आई क्या ?'' और जवाब में ' नहीं ' मिलने पर धूप वाली खड़ी दोपहरी में दरवाज़े पर जा कर डाकिये की राह देखना .... , क्या आनंद था उसमें , ये व्यक्त करना शब्दों के बस का नहीं । चिट्ठी में क्या लिखा है , उसका सुख तो पढ़ कर मिलता , लेकिन लिफाफे को छूने का सुख उससे कहीं बढ कर होता , मानों लिखने वाले के हाथ की खुशबू सीधे हम तक आ पंहुची हो । कॉलेज तक ये सिलसिला चलता रहा । फिर मानों समय ने अपनी जादुई झाड़ू फेरी हो , सालों कैसे बीत गए ,पता ही नहीं चला । सब कुछ बदलता रहा और पिछले पांच - छः सालों में तो इस बदलाव की गति कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गयी । इस गति के बहाव में सबके साथ हम भी बहे इसलिए कुछ बदलता सा महसूस नहीं हुआ , लेकिन कल अचानक बहुत दिनों बाद मोबाइल पर विविध भारती सुन रही थी । फरमाईशी गानों का कार्यक्रम चल रहा था और फरमाईशें थीं एस ० एम० एस ० के ज़रिये । बेशक अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप विविध - भारती पर बज रहे गाने बहुत कर्णप्रिय थे लेकिन मेरे मन की किसी सतह पर कहीं और कुछ और ही याद बज रही थी । याद आ रहे थे आकाशवाणी के वो दिन , फरमाईशी प्रोग्राम के लिए आने वाली चिट्ठियों के वो ढेर के ढेर और हमारा घंटों वो पत्र छांटना ... । एक ही श्रोता परिवार के बीसियों पोस्टकार्ड देखना और कहना - '' हे भगवान ! कैसे दीवाने लोग हैं ? पता नहीं इतना टाइम कैसे निकाल लेते हैं ? '' और सच कहूं फरमाईशों के एस ० एम ० एस ० के बीच मुझे अचानक ही वो दीवाने लोग बेहद याद आने लगे । ... तो विविध - भारती से भी चिट्ठियाँ गयी ? हम तो पहले ही आधुनिकता की दुहाई दे कर एक क्लिक पर बात कह डालना सीख चुके थे । अब कोई दीवानगी में डूब कर किसी को पाती पर पाती नहीं भेजा करेगा । किसी के पास समय नहीं। न लिखने का, न पढने का । शार्ट मैसेजेज़ और मेल्स का ज़माना है और यही शायद अब हमारी ज़रुरत भी । वैसे तो इस पूरे किस्से में बदलने वालों में हमारा भी नाम आता है लेकिन जाने क्यों मन में हूक सी उठी । कार्यक्रम के स्वरुप में ये बदलाव निश्चित रूप समय के साथ कदम से कदम मिलाने के लिए किया गया है लेकिन ये बदलाव मन को सोचने पर मजबूर कर गया । अब क्या सचमुच गुम जाएगी पाती ? और शायद साथ ही साथ गुम जायेगे पाती लिखने वाले और पाती पा कर उसमें लिखने वाले किसी अपने के हाथों की खुशबू खोजने वाले दीवाने लोग ... !

गुरुवार, 25 मार्च 2010

बंद करो ये इमोशनल अत्याचार !



इन दिनों मैं बहुत परेशान हूँ । दिन भर के काम की थकान के बाद जिन चीज़ों से मन बहलाती थी उनका बड़ा बुरा हाल हो गया है । सबके चेहरे बदल गए हैं , नाम गुम गए हैं। सब अपना रास्ता ही भूल गए हैं । मैं बात कर रही हूँ किसी समय में अपने फेवरेट (?) रहे उन धारावाहिकों की , जिन्हें देखना तो दूर सोचने भर से दिमाग हिलने सा लगता है । वो तब की बात थी और ये अब की बात है । तकरीबन दो साल हुए होगें , सास बहु के अझेल हो चुके प्रपंच रुपी धारावाहिकों की भीड़ में ठंडी पुरवाई सी आई थी हमारी आनंदी, बालिका - वधु। शाये-शाये के भयानक इफेक्ट्स और भयावह साजिशों के जाल में उलझे मन ने ईश्वर का लाख धन्यवाद दिया था कि कम से कम अब प्राइम टाइम के हारर से छुटकारा मिलेगा और शांत मन से मनोरंजन हो सकेगा । साथ ही साथ दिल ने लाख - लाख दुआएं दी थी उस भले मानस को , जिसने टी आर पी के अंधे शोर के बीच बाल विवाह जैसे अति संवेदनशील मुद्दे पर धारावाहिक बनाने का जोखिम भरा साहस दिखाया। बात में दम था । छोटी सी आनंदी ने रातों रात साजिशों का व्यूह भेदन करते हुए न सिर्फ सिर दर्द बन गयी बड़ी बहुओं को बाहर का रास्ता दिखाया बल्कि मनोरंजन के साथ शिक्षा और जागरूकता का संगम कर टेलीविज़न की दुनिया में क्रांति ला दी । आनंदी की नन्ही , मासूम अदाओं पर दिल फ़िदा हुआ और तभी इच्छा और तपस्या नाम की दो मासूम कलियों ने उतरन के ज़रिये मन मोह लिया । गरीबी - अमीरी की दीवार तोड़ते हुए निःस्वार्थ दोस्ती निभाती ये दो बच्चियां हरदिलअज़ीज़ बन गयी । कम से कम मैं तो इन तीनों बच्चियों की दीवानी रही ही । समय बीतता रहा जीवन के साथ धारावाहिक की कहानी भी आगे बढती रही । कभी - कभी मन सशंकित होता ज़रूर कि कही टी आर पी की आग में ये तीनों भी झुलस न जाये । फिर लगता .... अरे नहीं , इतने सधे हुए गंभीर विषय के भटकने की गुंजाइश ही कहाँ होगी ? लेकिन जय हो , उनकी जो बाज़ार की नब्ज़ पकड़ना जानते हैं (या जानने का मुगालता पाले हुए हैं)। देखते ही देखते इन दोनों धारावाहिकों की शक्ल ऐसी बदली कि अब तो पूरी डरावनी की श्रेणी में आ गए हैं । जिस स्टोरी लाइन को लेकर बात शुरू हुयी थी वो स्टोरी कहाँ गयी , ये एक बड़ा रहस्य है । बाल विवाह की सारी समस्याएं खानदानी दुश्मनी ,अविश्वसनीय चमत्कारनुमा घटनाक्रम और महाबोरिंग रोने - धोने में ऐसी खोयीं कि देखने वाले सिर धुनते रह गए। हर एपिसोड के अंत में आने वाला ब्रम्ह वचन भी असर छोड़ कर ऊटपटांग की श्रेणी में जा पहुंचा । मोरल ऑफ़ द स्टोरी ये रहा कि आप आराम से छोटी बच्चियों के विवाह कीजिये , हम उम्र से या दुगनी उम्र वाले से , कुछ समय बाद खानदानी दुश्मनी की खुरपेंच में फंसने और एक दो बच्चे पैदा करने के बाद सब की सब लाइन पर आ जायेगीं और आप आराम से कह सकेगें 'आल इज वेल '। दूसरी तरफ का हाल भी कुछ ज्यादा अलग नहीं । अगर आप अमीरी - गरीबी की सीमाएं तोड़ कर दोस्ती हो जाने के फलसफे में यकीन करते हैं तो उतरन देखिये और अपने मुगालते से बाहर आईये । अगर आप गरीब है और अपनी औकात भूल कर पैसे वाले से दोस्ती करना चाहते हैं तो याद रखिये , कुछ सालों बाद आपका वही अज़ीज़ दोस्त अपनी साजिशों से आपका वो बुरा हाल करेगा कि आप दोस्ती क्या अपना नाम भी भूल जायेगें , बिलकुल इच्छा की तरह । इन दोनों सीरियल्स का जो कबाड़ा खुद इनके ही निर्माता - निर्देशक -लेखक द्वारा किया गया है , उसे देख कर रोना भी नहीं आ पाता। शायद ये सब बेचारे सिरे से भूल गए हैं कि उन्होंने अपना धारावाहिक किस कहानी को लेकर शुरू किया था और उस कहानी का मकसद क्या था ।या फिर शायद इन्हें अपने दर्शकों की बेवकूफी पर पूरा भरोसा है और ये सोचते हैं कि इनकी हर बेसिरपैर की प्रस्तुति पर हम दर्शक इनकी प्रशंसा के लिए बाध्य हैं । मैं किसी भी तरह विशेष कर इन दोनों धारावाहिकों के (क्योकि दुर्भाग्य से मैं इन्हें देखती हूँ ) नीति निर्माताओं तक अपनी ये गुहार पहुँचाना चाहती हूँ कि कृपा कर दर्शकों पर ये इमोशनल अत्याचार करना बंद करें । कहानी अगर आगे नहीं बढ सकती तो भगवान के लिए उसे ख़त्म कर दें , खींच - खींच कर हमारा बीपी न बढाए। हमारे दिमाग का दही करने के लिए ज़िन्दगी में और भी ढेरों दूसरे साधन (!) मौजूद हैं , आप कृपया कष्ट न उठायें । अभी जब आनंदी माथे के बीचों बीच गोली खा कर मरने के बजाये कोमा में चली गयी तो सच मानिये हम बहुत हँसे (क्या करें , रोना तो चाह कर भी नहीं आया) और खुद से शर्त भी लगा ली कि ये बच जाएगी और शर्त जीत भी गए , लेकिन सच मानिये मज़ा नहीं आया। अरे, बचाना ही था तो गोली हाथ - पाँव कही भी मरवा देते ।, सीधे दिमाग को निशाना लगाने की क्या ज़रुरत थी । कहीं ऐसा तो नहीं कि आनंदी के बहाने आप दर्शकों का दिमाग ब्लास्ट करना चाहते हैं । लेकिन अब ऐसा होना कुछ मुश्किल है । वो दिन हवा हुए जब मिहिर के मरने और तुलसी के जेल जाने पर हमारे साथ पूरा देश रोया करता था । अब हमें बेवक़ूफ़ बनाना उतना आसान नहीं रहा । अब हम थोड़े समझदार हो गएँ हैं ,इसीलिए ये गुज़ारिश कर रहें हैं कि ये इमोशनल अत्याचार बंद नहीं हुआ तो हम सीरियल्स देखना ही बंद कर देगें ।

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...