बुधवार, 25 नवंबर 2009

परिंदों का दर्द

दहशत से भरी थी उनकी नन्ही आँखे ,
उन आँखों में था ,सामने इमारत से उठ रहे धुएं का काला साया ,
जो कल उनकी पहचान थी ,
या यूं कहे ,
कल तक वो थे पहचान ,
उस शानदार बुलंद इमारत के...,
वो नही जानते थे कि क्या हुआ
मगर
था उन्हें भी अंदाज़ , कि हो गया है कुछ ऐसा
जो नही होना चाहिए था ...,
पिछली शाम जहा झूम रही थी जिंदगी ,
आज वही गूँज रहे थे गोलियों के धमाके ,
बुरे ख्वाब जैसे एक हादसे ने
छीन लिया था सारे शहर के साथ
उनका भी सुकून ...,
और
वो
फडफडा कर अपने पंख ,
उड़ते फिर रहे थे ,
हवाओं में इधर से उधर ,
दर्ज करते हुए इस हादसे के ख़िलाफ़
अपना विरोध ... !
शर्मिंदा था सारा मुल्क ,
और शर्मिंदा थे वो मासूम परिंदे ,
वो नन्हे शान्ति दूत भी ,
कि उनके सामने होते हुए भी लग गई ये आग ,
वो भी कायम नही रख सके
अमन अपने शहर का ... !
(गेटवे ऑफ़ इंडिया की पहचान "अमन के दूत " कबूतरों के नाम ......)

प्रतिमा

सोमवार, 16 नवंबर 2009

सचिन तुस्सी सचमुच ग्रेट हो !


मन खुश गया । एक तसल्ली और सुकून से ज़ेहन भर गया । सचिन ,आपका शुक्रिया कि आपने जात , प्रान्त और भाषा की छोटी - संकुचित सरहदें तोड़ते हुए पूरी सच्चाई , ईमानदारी और बेबाकी से अपनी बात कहने का साहस दिखाया । आपकी महान छवि को यही शोभा भी देता है । शायद आपकी यही भावना और हमारा आप पर यही विश्वास है जिसने आपको विश्व खेल जगत में भारतीय गौरव और अस्मिता का पर्याय बना दिया है । खेल के मैदान में जब आप "इंडिया" लिखी हुई अपनी टी शर्ट पहन कर खेलने उतरते हैं तो जैसे सिर्फ़ आप ही नही , आपके साथ पूरा भारत विरोधी टीम के खिलाफ खेल रहा होता है क्योंकि आप किसी एक प्रान्त या भाषा के लिए नही बल्कि पूरे देश के सम्मान के लिए खेलते हैं । आपके एक - एक रन पर सिर्फ़ किसी एक प्रदेश के नही भारत भर के लोग झूम उठते हैं । आपका हर रिकार्ड किसी एक भाषा या प्रान्त तो छोडिये केवल आपका भी नही होता , वो हम सब भारतवासियों का सांझा होता है । ऐसे में अगर आप भी यही कहते कि " मैं भारतीय नही सिर्फ़ मराठी माणुस हूँ " तो सच जानिए न केवल हम सब का दिल बहुत दुखता बल्कि हमारा आपसे विश्वास भी डिग जाता । लेकिन आपने ऐसा नही किया । एक सच्चे इन्सान और भारतीय होने के नाते आपने अपने देश के प्रति अपनी आस्था , आदर और समर्पण व्यक्त किया और भारतीय संविधान की मर्यादा और महानता को स्वीकार करते हुए यह भी माना कि मुंबई हर भारतीय की है । यही सच भी है सचिन , सिर्फ़ मुंबई ही नही , बल्कि भारत का एक -एक अंश , भारत के एक -एक नागरिक का साँझा है और ये अधिकार स्वयं भारत के सर्वोच्च संविधान द्वारा प्रदत्त है । किसी को भी इस अधिकार के अतिक्रमण या उल्लंघन की शक्ति नही दी गई है । जो ऐसा कर रहे हैं वो किसी व्यक्ति के नही भारतीय संविधान के दोषी हैं । संकट की इस घड़ी में आपका, तुच्छ मानसिकता से बहुत ऊपर उठ कर ,अपनी बात कहने का ये अंदाज़ ये साबित करता है कि आप भारत लिखी हुई टी शर्ट पहनने और भारतीय अस्मिता की नुमाइंदगी करने के सच्चे हक़दार हैं और जो आपकी इस सच्चाई को नज़र अंदाज़ करते हुए , आपके नाम को गन्दी राजनीति के दलदल में खींचने में जुटे हैं उनके लिए फिलहाल बस इतनी ही प्रार्थना - "ऐ खुदा इन्हें कभी माफ़ मत करना , क्योंकि ये अनजान नही। ये अच्छी तरह जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं । ये किसी के भी सगे नही । धर्म - जाति- भाषा - प्रान्त - सम्प्रदाय के नाम पर राजनीति कर के वोट बटोरना ही इनका धंधा है और ये अपना धंधा चमकाने के लिए किसी भी हद तक जाने से नही चूकने वाले । तू , बस हमें सही और ग़लत समझने की तौफीक दे और इतनी हिम्मत भी कि हम ग़लत को ग़लत कहने का साहस कर सके । "
प्रतिमा

बुधवार, 11 नवंबर 2009

मुझे क्षमा करें


मैं सचमुच तहेदिल से माफ़ी मांगना चाहती हूं कि मैं हिन्दी बोलती हूं , हिन्दी लिखती हूं , शायद हिन्दी में ही सोचती भी हूं . मैं हिन्दी प्रदेश में पैदा हुई हूं , मेरे माता - पिता हिन्दी भाषी हैं ।अब तक नहीं थी लेकिन अब मैं सचमुच इस बात से शर्मिंदा हूं और भयभीत भी ... । पता नही क्या हो , कब मुझे हिन्दी बोलने के लिए दण्डित कर दिया जाय, नहीं जानती । मुंबई बहुतेरे लोगों कि तरह मेरी भी स्वप्न नगरी है मगर अब अपनी इस स्वप्न नगरी में जाने का ख्याल मुझे डरा रहा है क्योंकि मैं अपराधी हूं । मैं हिन्दी भाषी हूं।

सोमवार, 9 नवंबर 2009

तुम्हें गैरों से कब फ़ुरसत, हम अपने ग़म से कब ख़ाली ,
चलो बस हो चुका मिलना , न हम ख़ाली - न तुम ख़ाली !
बड़ी अजब सी कैफियत होती है , जब मन में कहने को बहुत कुछ हो लेकिन कहने के लिए न अल्फाज़ हों , न वक्त की मोहलत । और तो और सुनने वालो को भी सुनने की फ़ुरसत न हो । ऐसे में अचानक ही महसूस होता है जैसे सब कुछ बेकार , बेवजह , बेसबब है। ये ज़िंदगी , ये दुनिया , ये लोग , सब कुछ ... । एक शैतान अँधेरा , जाने किधर से आता है और सारे वजूद को अपनी गिरफ्त में ले लेता है । कुछ यूँ ही सी रही , मन की हालत पिछले दिनों ... । दुनियावी मसरूफियात में उलझा मशीन बना ये जिस्म और इसके भीतर किसी और ही सतह पर पता नहीं क्या खोजता , तलाशता, भटकता , छटपटाता मन ... । लेकिन शुक्र है । अंधेरे की शैतानी जब हद से बढ़ जाती है , रौशनी , किसी न किसी दरार से मेरे भीतर आने का रास्ता बना ही लेती है । तो ...... एक बार फिर मन रोशन है । मैं फिर अपनी धुन में चल पडी हूँ। पसार लिए हैं फिर से पंख , अपने आकाश में परवाज़ भरने के लिए ... !

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

बुद्ध की शरण में...!


बीते सितम्बर माह में मुझे कोलम्बो (श्रीलंका) जाने का अवसर मिला । हमारी फ्लाईट बोध - गया से थी सो पहले हम वहाँ पहुंचे, फिर वहाँ से कोलम्बो । इस पूरी यात्रा में बहुत कुछ देखने समझने का मौका मिला । श्रीलंका आशंका के प्रतिकूल एक बहुत ही सुंदर और आकर्षक जगह थी । एक तरफ़ शहर , दूसरी तरफ़ समंदर ... । धूप के बावजूद हवा में एक अजब प्यारी सी नमी थी । श्रीलंका को एक बुद्धमय देश कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । हर तरफ़ भगवान तथागत बुद्ध के दर्शन किए जा सकते हैं । सड़कों पर भी जगह-जगह भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाएँ स्थापित हैं । हमने कोलम्बो से तकरीबन ५०-६० किमी दूर कलूतरा नाम के स्थान पर भगवान बुद्ध के एक बेहद सुंदर मन्दिर के दर्शन किए । इस मन्दिर की ये विशेषता है कि ये स्तूप के आकार का है और इसकी परिक्रमा भीतर से की जा सकती है । प्रचलित रूप में बौद्ध स्तूप की परिक्रमा बाहर से की जाती है । (ये जानकारी मुझे जयसूर्या ने दी , जो श्रीलंका का स्थानीय निवासी होने के साथ ही इस यात्रा में हमारा ड्राईवर और गाईड भी था ।) स्तूप रुपी इस मन्दिर के भीतर चारों ओर भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाएँ थीं । चारों तरफ दीवार पर उनके जीवन पर आधारित चित्र उकेरे हुए थे । एक अलौकिक शान्ति की अनुभूति से युक्त ये मन्दिर सचमुच बहुत सुंदर था ।
प्रतिमा ...!

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

एक खूबसूरत पल !


कुछ पल शब्दों में बांधे नहीं जा सकते ,बस महसूस ही किए जा सकते हैं । ये एक ऐसा ही पल था । मैं सागर के बिल्कुल करीब थी । अपनी आंखों से उसकी अनंत असीमता को निहारती , उसकी अथाह गहराई में झाँकने का असफल प्रयास करती ,उसकी अकूत जलनिधि को अपनी नन्हीं अंजुरी में भर लेने का असंभव स्वप्न देखती ... , पूरी तरह चमत्कृत और निःशब्द ...



अचानक ही वो प्रशांत -धीर -गंभीर मानों चंचल हो उठा जैसे मेरी उदास खामोश निगाहों को पढ़ कर मेरी उदासी को अपनी उदात्त लहरों के साथ बहा ले जाना चाहता हो । जैसे बरसों बाद मिला कोई अपना सा साथी मीठी सी गुदगुदी कर अपनी दोस्त को हंसा देना चाहता हो । और सचमुच .... जाने कौन सी मीठी बात कही उसने मेरे कानों में , कि
मैं खिलखिला कर हंस पडी ।

''मैं '' प्रतिमा ...

(On Colombo Sea Beach-Srilanka)

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

सब जग हो उजियारा ...!


जलाओ दिए , पर रहे ध्यान इतना ,
अँधेरा धरा पर, कहीं रह न जाए ... !
सब अपनों को शुभ दीपावली की मंगल कामनाएं ...,
प्रतिमा की ओर से !!!

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...