
माटी में बीज सा ख़ुद को बोना, बरखा सा ख़ुद ही बरसना, फिर उगना ख़ुद ही जंगली फूल सा. कांटना-छांटना-तराशना-गढ़ना ख़ुद को आसान नहीं होता. सिद्धि प्राप्त करनी होती है ख़ुद तक पहुँचने के लिए. धार के विपरीत बहना पड़ता है थकान से भरी देह उठाये तय करना पड़ता है रास्ता बिलकुल अकेले. दूसरों पर जय पाने से पहले ख़ुद को जय करना (जीतना) होता है...तब बनता है कोई "स्वयंसिद्ध" !!
शनिवार, 29 अगस्त 2009
(18) आँखें ... !

रविवार, 23 अगस्त 2009
(17) उलझन...!
''मैं '' प्रतिमा ........ !
बुधवार, 19 अगस्त 2009
(16) उनके शब्दों में ...!
गीले बादल , पीले रजकण ,
सूखे पत्ते , रूखे तृन घन ,
ले कर चलता करता ' हरहर '- इसका गान समझ पायोगे ?
तुम तूफ़ान समझ पायोगे ?
गंध भरा यह मंद पवन था ,
लहराता इससे मधुबन था ,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान , समझ पायोगे ?
तुम तूफ़ान समझ पायोगे ?
तोड़ - मरोड़ ,विटप - लतिकाएँ ,
नोच -खसोट , कुसुम - कलिकाएँ ,
जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम , उड़ जाओगे !
तुम तूफ़ान समझ पाओगे ... ?
''मैं'' प्रतिमा...
शनिवार, 15 अगस्त 2009
(15) जश्ने आज़ादी सबको मुबारक ... !

आज़ादी की खूबसूरत सौगात ले कर आयी आज की तारीख हम सबके लिए एक ख़ास अहमियत रखती है । आज १५ अगस्त है । सुबह से ही गली - चौराहों , स्कूलों - कॉलेजों , ऑफिसों और रेडियो पर देश - भक्ति गीत बज रहे हैं । हर हाथ में तिरंगा शान से लहरा रहा है । जिसे देखो वही देश भक्ति के रंग में रंग कर इतरता फिर रहा है ।सचमुच बहुत ही अच्छा लग रहा है , मगर कल ... । कल शायद तारीख पुरानी पड़ते ही ये सारी बातें भी पुरानी हो जायेगीं । देश भक्ति के गीत बजने बंद हो जायेगें , दैनिक व्यस्तता में देश - प्रेम की बातें बिसरा दी जायेगीं और आज हाथ - हाथ में शान से लहरा रहा तिरंगा कल कचरे के डिब्बे में पहुँच जायेगा । माफ़ कीजियेगा अगर मेरी बातें बुरी लगें लेकिन क्या करूं सच यही है । आज़ादी के जश्न के मायने अब हमारे लिए एक छुट्टी से ज़्यादा नही रहे । कितना अच्छा हो , अगर हम आज के दिन घूमने - फिरने , पिक्चर देखने और मौज - मस्ती करने के साथ ही साथ एक बार ही सही अपने देश के बारे में सोच सकें । अपने बच्चों को आज़ादी के सही मायने समझा सकें और वाकई पूरी ईमानदारी से कह सकें - हाँ ... हमें भारतीय होने पर गर्व है । अगर आप ऐसा कर पाए हैं तो आपको स्वतंत्रता दिवस की असीम शुभ कामनाएँ ... !
मैं- प्रतिमा !!!
गुरुवार, 13 अगस्त 2009
(14) एक दोस्त के लिए ... !
बुधवार, 12 अगस्त 2009
(13) संवेदना ... !

मंगलवार, 11 अगस्त 2009
(12) एक अनुत्तरित प्रश्न ... !

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !
शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...
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जाने क्यों आज रोने को जी चाह रहा है , जाने क्यों भरी चली जा रहीं हैं पलकें, सुधियों की भीड़ से , जाने क्यों हर बात आज जैसे छू रही है मन ,...
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मैं एक लड़की ...! मुठ्ठी में भींचे कुछ उम्मीदें , पलकों में छुपाए चाँद सपनें , देखती हूँ ,हर रोज़ , आसमान की ओर ...., सोचती हूँ ,क्या छू सकूं...
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शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...

