गुरुवार, 9 सितंबर 2010

नेमतें लाया चाँद ईद का..... !


एक महीने की इबादत ,रोज़े,नमाज़,तरावीह और जब्त के साथ बिताये गये वक्त का ईनाम मिलने ही वाला है. चाहत का जाम लेकर, दिलकश पयाम लेकर,खुशियाँ तमाम लेकर,लो ईद आ रही है...कितने खुशकिस्मत हैं हम लोग,जो हिन्दुस्तान में पैदा हुए हैं और हमें कुदरत और इंसान दोनो की बख्शीं नेमतें और खुशियाँ जीभर के जीने का मौका ऊपर वाले ने दिया है. जिस-जिस तक मेरे ये अल्फ़ाज़ पहुँचे, उन सबको मेरी और मेरे वतन की ओर से ईद की ढेरों मुबारकें...!
ईद की दुआएं, सबके लिये




सब खुश हों ,हर मुँह में सेंवई की मिठास हो, हर ज़ुबान पर अमनोअमान के लिये दुआएं हों, हर दिल में सबके लिये प्यार-दोस्ती हो, हमारे लिये तो बस यही सबसे कीमती ईद हो जायेगी.और ये एक बहुत प्यारा सा शेर ,आप सबके लिये, जो मेरे शहर और अदबोशायरी के बहुत मकबूल और हरदिलअज़ीज़  शाएर जनाब मेयार सनेही की कलम से निकला है -

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मुख्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ एक मुलाकात



बात पूरी करने पहले साफ़ कर दूँ कि मुख्य प्रदेश को भारत के नक्शे पर खोजने की कोशिश मत कीजियेगा . ये प्रदेश आपको आमिर खान प्रोडक्शन की हालिया फ़िल्म पीपली लाइव में मिलेगा और अगर आपने ये फ़िल्म देखी है तो निश्चित रूप से आपको मुख्यमंत्री महोदय भी याद होगें जो नत्था की आत्महत्या के एलान के बाद नत्था और अपनी इमेज दोनों को बचाने के द्वन्द्व में फँसे रहते हैं. पर्दे पर इस किरदार को दमदार तरीके से निभाने के लिये आमिर खान प्रोडक्शन ने जिस कलाकार को चुना , वो थे रंगमंच के सशक्त अभिनेता और भा० ना० अ० , लखनऊ-रंगमंडल के प्रमुख श्री जुगल किशोर जी. पिछले दिनों एड्स पर आधारित त्रिपुरारी शर्मा द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक शिफ़ा की टीम के साथ जुगल जी बनारस में थे . स्थानीय समन्वय हमारी संस्था सेतु ही कर रही थी तो मुझे जुगल जी से कुछ बातें करने मौका मिल गया , जो हमेशा की तरह मेरे लिये एक खास अनुभव था.रंगमंच जीवन के यथार्थ से जुडा माध्यम है , जबकि सिनेमा को लार्जर दैन लाइफ़ कहा जाता है .दोनो ही माध्यमों में सबसे बडा फ़र्क है पहुँच का. जुगल जी ने बातचीत के दौरान कहा भी कि इस वक्त मैं आपसे यहाँ बैठा बातें कर रहा हूँ और दुनिया भर में जाने कितने लोग इसी वक्त मुझे सिनेमा के पर्दे पर देख रहे होंगे.नाटक में हमें रोज़ अपनी जगह ,अपने किरदार में मौजूद होना पडता है जबकि फ़िल्म एक बार बन जाये तो वो कालजयी हो जाती है. फिर उस कहानी में वो किरदार और किरदार के माध्यम से कलाकार हमेशा ज़िन्दा रहता है.और भी ढेरों बातें हुई और ये मुलाकात भी मेरे यादगार लम्हों में शामिल हो गयी.

बुधवार, 25 अगस्त 2010

एक मुलाकात-एक अनुभव ... !


२४ अगस्त को श्रीमती नादिरा ज़हीर बब्बर बनारस में थीं , अपने नाटक  आप कहें-हम सुनें  के साथ . मुझे एक मौका मिला उनसे मिलने और बात करने का. हमेशा की तरह एक मुलाकात और एक उपलब्धि रही मेरे हिस्से में. रक्षाबंधन का दिन .... , काफ़ी दिनों से काम में लगे रहने के बाद सारा दिन आराम करने का मूड...., उस पर सावन के कारे कजरारे बादलों की मनभावन आँख-मिचौली और टिप-टिप बरसती बूँदें....,कुल मिला कर घर से बाहर निकलना खुद पर बस एक जुल्म करने जैसा ही था. शाम तक जब बारिश तेज़ हो चली तो प्याज़ के पकौडे भी याद आने लगे,लेकिन नादिरा जी तक पहुँचने की जल्दी प्याज़ काटने और पकौडे तलने की मोहलत भला कब देने वाली थी तो बस बारिश में भीगते-भागते पहुँच ही गये हम उनसे मिलने और मिल कर सचमुच अच्छा लगा.
रंगमंच एक प्रतिष्ठित नाम , जिन्होंने अपना जीवन ही रंग कर्म को समर्पित कर दिया लेकिन मिलने पर पाया एक अति विनम्र कलाकार को ,जो मुझे बोलीं कि नहीं , मुझमें ऐसा भी कुछ खास नहीं , जिसकी इतनी तारीफ़ की जाय. उन्होंने ऐसा कहा लेकिन मैंने ये माना नहीं क्योंकि मैं जानती थी कि जिस शख्सियत के साथ मैं हूँ उसने अपने काम से सच्चा प्यार किया है, पूजा है और अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है और ऐसे लोग हमेशा आने वाली पीढियों के लिये आदर्श होते हैं, प्रेरणा की भूमिका निभाते हैं, रास्ता दिखाते हैं और बेशक तारीफ़ के काबिल होते हैं.

शनिवार, 7 अगस्त 2010

वो एक लड़की ...


मैं एक लड़की ...!
मुठ्ठी में भींचे कुछ उम्मीदें ,
पलकों में छुपाए चाँद सपनें ,
देखती हूँ ,हर रोज़ ,
आसमान की ओर ....,
सोचती हूँ ,क्या छू सकूंगी कभी
अपना आसमान ......?
मैं एक लड़की ......!
मुस्कान में कुछ दर्द तोलती ,
आंसुओं में थोड़ी आशा घोलती ,
देखती हूँ हर रोज़
चाँद की ओर ....,
सोचती हूँ ,क्या पा सकूंगी कभी
अपना चाँद .....?
मैं एक लड़की .....!
क्या कभी बदल सकूंगी हकीकत में अपने सारे ख्वाब ...?
मैं एक लड़की ...!!!
सोचती हूँ .....,सोचती जाती हूँ ...,
कि
तभी ,
पलकों से आंसू की एक बूँद
गिरती है मेरी हथेली पर
और
जैसे बोल पड़ती है मुस्कुरा करके ,
उदास मत हो ,मत हो निराश ,
वो दिन आयेगा ज़रूर ,
जब तुम अपने पंख पसार छुओगी
आसमान
और कहेंगे सब ---
" देखो अपने ख्वाबों को सच कर दिखला रही है ...,
अपने हिस्से के चाँद - सितारे - आसमान पा रही है ...,
वो एक लड़की !!!!!!!!!!!!

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

बस यूं ही .........

हाँ , बस यूं ही क्योंकि कभी - कभी कुछ बस यूं ही भी करना चाहिए । एक पुराना दर्द फिर उभरा हुआ है । नेट महोदय ने फिर हाथ खड़े कर दिए हैं पिछले लगभग एक सप्ताह से । वजह मत पूछिए । शायर का शेर याद आ गया - '' मुझसे मत पूछ मेरे दिल की कहानी हमदम , इसमें कुछ पर्दानशीनों के भी नाम आते हैं । '' अब पूरी तरह से ये मेरे हालात पर फिट नहीं बैठता , मगर मैंने पहले ही कहा न आज बस यूं ही । क्रोध तो बहुत आ रहा है , मगर ------

गुरुवार, 24 जून 2010

एक मजेदार विश्वास ... !



विश्वास के साथ मजेदार शब्द का प्रयोग कुछ अटपटा लग सकता है , लेकिन इसके अलावा कोई और शब्द सूझा भी नहीं , सो लिखना पड़ामेघ देवता को मनाने के लिए शहर में इन दिनों मेढक - मेढकी की शादीकराई जा रही है पता नहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश के सिवा कही और ये विश्वास है कि नहीं , लेकिन हमारे यहाँ तो इस रिवाज़ के साथ पूरा विश्वास जुड़ा हैअगर समय होने पर भी इंद्र देव मेहरबान हों तो इस शादी वाले टोटके के बाद वो ज़रूर पिघलतें है , ऐसी मान्यता हैबड़ी मज़ेदार होती है ये शादी , वो भी पूरे विधि - विधान के साथ......, पंडित जी मंत्रोच्चार करते हैं, दुल्हन सिन्दूर धारण करती है , दूल्हा - दुल्हन पवित्र अग्नि के फेरे लेते हैं , फिर नवयुगल के सुखद जीवन की कामना की जाती हैइतना सब करने के पीछे विश्वास होता है कि जब ये नव - विवाहित जोड़ा श्रंगार रस में डूब कर नृत्य करके मेघों का आह्वान करेगा तो घनघोर बारिश होगी । इस टोटके के लिए असली मेढक - मेढकी ढूंढें जाते हैं और ये न होने की स्थिति में प्लास्टिक के जोड़े से भी काम चलाया जा सकता है , बस नीयत साफ़ होनी चाहिए । है न एक मज़ेदार विश्वास । अब इस विश्वास का आधार क्या है , ये परखने का काम अपने - अपने विवेक पर छोड़ दिया गया है और एक बात बताऊँ ? कल बनारस में कई जोड़ों की शादी हुई और आज सुबह से ही तपते मौसम में कुछ राहत सी महसूस हो रही है । सुबह हलकी बारिश भी हुई । अब आप इसे चाहे जो कह लें । विश्वास है तो है ... और वो कहते है न विश्वास पर दुनिया कायम है !!!!!!!

गुरुवार, 17 जून 2010

खामोश ... राजनीति चालू आहे !


राजनीति यानी राजा की नीति ही प्रजा की नियति तय करती है इसलिए ये ज़रूरी है कि अच्छे और सच्चे लोग इस " कुरुक्षेत्र " में सक्रिय रूप से आगे आयें और राजनीति की धूमिल छवि को स्वच्छ करके इसे आगे ले चलेंइस बात की हिमायत और वकालत अक्सर ही की जाती रही है और हर बार बुद्धिजीवी वर्ग चाहे विनम्रता चाहे तल्खी के साथ इस प्रस्ताव को ख़ारिज करता रहा है । प्रकाश झा की राजनीति एक बार फिर इसी बात को पूरी ताकत के साथ ख़ारिज करती है। राजनीति एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती नज़र आती है कि इस कुरुक्षेत्र में अच्छे और सच्चे लोगों की न कोई जगह है , न ही कोई ज़रुरत । ये दरअसल काजल की वो कोठरी है , जिसमें कैसो भी सयानो जाय, काजल का दाग भाई लागे ही लागे !
सच्चाई , ईमानदारी और भावुकता इस धंधे की सबसे खतरनाक अयोग्यता है जो अंततः मौत के द्वार खोलती है और प्यार - मोहब्बत - दोस्ती - वफ़ा जैसे फ़ितूर सुनिश्चित विनाश के दरवाज़े तक पहुंचा देते हैं , यही है राजनीति... ! अपनी प्रतिष्ठा और दर्शकों की अपेक्षानुरूप प्रकाश झा ने एक सच्चाई उधेड़ती फिल्म प्रस्तुत कर के एक फ़िल्मकार के रूप में अपनी मेधा का परिचय तो दिया ही है साथ ही ये भी साबित कर दिया है कि बिना मुम्बईया लटके - झटके के भी एक सार्थक फिल्म को सराहने की तमीज भारतीय सिने दर्शक को हैपूरी फिल्म बिना सिचुएशनल गीत -संगीत की बैसाखी के आगे बढती है और अपनी बात कहने में कामयाब रहती हैबस एक प्रतीकात्मक भाव संप्रेषित करता हुआ गीत " मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं " बैक ग्राउंड स्कोर की तरह बजता है,बिना कोई व्यवधान डालेजैसा कि उत्सुकता थी और उम्मीद भी ,सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं के साथ एकाकार होते दिखाई पड़ते हैं , बस कुछ जगह कुछ बातें अखर जाती हैंजैसे एक बेहद छोटी और औचित्यहीन भूमिका में नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज का होनानसीर जिस मयार के कलाकार हैं , वहाँ दरअसल छोटी - बड़ी भूमिका से कोई फर्क नहीं भी पड़ता ,क्योंकि उनके होने से ही किरदार बड़ा हो जाता है लेकिन जिन लोगों ने फिल्म देखी है उन्होंने शायद महसूस किया हो , जिस तरह शुरुआत के बाद ही नसीर का किरदार कहानी से हमेशा - हमेशा के लिए गायब हो जाता है वो भी बिना कोई सूत्र छोड़े, वो हजम नहीं होताअजय देवगन लाख बेहतरीन अभिनेता सही, मगर वो नसीरुद्दीन शाह का एक्सटेंशन (कहानी के अनुसार) नहीं हो सकतेये बात कम से कम मुझ जैसे नसीर के प्रशंसकों के गले तो नहीं ही उतरती और तुरंत दिमाग में आता है ये ख़याल कि इतना ही करना था तो किसी और को भी लिया जा सकता था इस रोल के लिएदूसरी बात जो इस फिल्म को देखने के बाद अखरती है वो है कैटरीना कैफ के किरदार के इर्दगिर्द गढ़ा गया इस फिल्म का प्रमोशन - प्लानकैट के जिस तेवर और नेता वाले तेवर की हर ओर चर्चा है वो फिल्म ख़त्म होने के बमुश्किल पांच या दस मिनट पहले परदे पर आता है और गुज़र जाता है और दिमाग में कौंधता है दूसरा ख़याल कि बेशक राजनीति कैटरीना जैसी ग्लैमरस अभिनेत्री के कैरियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक है और बेशक उन्होंने इसमें अब तक का अपना बेहतरीन अभिनय किया है लेकिन अगर इस किरदार में कोई दूसरी अभिनेत्री भी होती तो कुछ ख़ास फर्क पड़ने वाला नहीं था और सबसे बढकर जो बात इस फिल्म को देखनेके बाद अखर जाती है , वो है इस फिल्म यानी राजनीति की हैप्पी एंडिंग ... और उसके बाद सब ख़ुशी - ख़ुशी रहने लगे वाले भाव को दर्शाता फिल्म का अंत दिमाग में बेसाख्ता ही तीसरे ख़याल को कौंधने पर मजबूर कर देता है कि ये तो राजनीति का अंत नहीं हो सकता ...... , ये अंत नहीं है ..... । दरअसल प्रकाश झा की राजनीति जहाँ ख़त्म होती है , वही असली राजनीति के शुरू होने का बिंदु हैहांलाकि ढाई - तीन घंटों में एक पूरे कथानक को समेटने की चुनौती से निपटने का यही सहज और सरल मार्ग था , लेकिन प्रकाश झा जैसे विज़नरी और साहसी फ़िल्मकार से चुनौतियों से निपटने के सरल मार्ग अपनाने की अपेक्षा कुछ कठिन और कठोर विकल्प अपनाने की अपेक्षा कीजानी चाहिए , जिस पर खरा उतरने से झा कुछ चूक गए । पूरी फिल्म में इमोशन या सेंटीमेंट्स का कोई काम नहीं थाभाई , चाचा , पिता ,पति, दोस्त ,प्रेमी , नौकर ,मालिक यहाँ तक की माँ की भी हर क्रिया - प्रतिक्रया राजनीति से प्रेरित थी , अगर ये सच्चाई को दिखाने की कोशिश थी तो इस सच्चाई को यहाँ तक उधेड़ देना चाहिए था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचाते ही इंदु (कैटरीना) भी इसी काजल में रंग कर छल - बल - साम-दाम - दंड - भेद की ताकत को पहचानती और सही अर्थों में राजनीति और सत्ता का मर्म समझ लेतीवो मर्म , जिसे समझ लेने के बाद इंसान कुछ और नहीं सोचता... , कुछ और नहीं समझता ..., कुछ और नहीं देखता... , सिवाय अपनी कुर्सी , स्वार्थपूर्ति और छल - छद्म के ..... !शायद ये अंत एक कड़वी हकीकत के और करीब होताबहरहाल राजनीति कम से कम आज के दौर की एक बेहतरीन फिल्म तो कही ही जा सकती हैसोये हुए को झकझोरने के लिए प्रकाश झा का शुक्रिया ... !

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...