मंगलवार, 25 मई 2010

बस एक पल .............!


" मौत का एक दिन मुईन है " ये लिखते समय यक़ीनन ग़ालिब भी इस हकीकत से वाकिफ़ रहे होगें कि ये मामला दरअसल एक दिन नहीं ,बल्कि महज एक पल का हैबस ...... एक ...... पल ..... ! या फिर उसका भी हजारवां हिस्सा ..... , बस इतना सा ही फ़ासला होता है ज़िन्दगी और मौत के बीचइतनी ही देर लगती है हैं से थे होने मेंलिखना और भी बहुत कुछ चाहती हूँ मगर पता है , ये वक्त फ़लसफ़ा झाड़ने का नहीं सख्त अफ़सोस करने का है । विश्व की महाशक्तियों में शुमार होने के लिए कमर कसे हमारे देश में एक विख्यात उड्डयन कंपनी का विमान रनवे पर सुरक्षित उतरने में नाकाम रहा और १५८ लोग रात की नींद टूटने से पहले ही हमेशा के लिए मौत की गोद में सो गए । एक ऐसा भीषण हादसा , जिसने हर सुनने वाले का दिल दहला दिया । गलती किसकी थी , चूक कहाँ हुयी ,कारण क्या थे , ये सब जानने के लिए जाँच एजेंसियों को काम मिल चुकाहै । फ़िलहाल सारा दोष विदेशी पायलेट के सिर मढ़ा जा रहा है । ये आसान भी है क्योंकि वो बेचारा तो अब अपनी सफाई देने आने से रहा । लेकिन सौ बात कि एक बात ये कि जो चिराग उजाला होने के साथ ही बुझ गए उनमे अब फिर कभी रौशनी नहीं आयेगी ।

सोमवार, 24 मई 2010

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है ?


आजकल मेरे शहर में प्रगति कार्य ज़ोरों पर है और चूंकि मेरे शहर में हर प्रगति कार्य की शुरुआत सड़क की खुदाई से होती है इसलिए अब आलम ये है कि शहर की लगभग सारी मुख्य सड़कें या तो खोदी जा चुकी हैं या फिर खोदी जाने वाली हैं इस अनवरत और धुआंधार सड़क खुदाई के चलते मेरा शहर मैदानी से पहाड़ी और शहरी से ग्रामीण क्षेत्र में तब्दील हो चुका है चूंकि प्रगति की बहुत जल्दी थी इसलिए ये व्यवस्था नहीं बनाई गयी कि एक काम पूरा हो जाने के बाद ही दूसरे काम में हाथ लगाया जाये और हर तरफ एक साथ ही काम शुरू हो गया अब अगर घर से ऑफिस की दूरी घड़ी देख कर आधे घंटे की है तो बेहतर ये होगा कि घर से दो घंटे (बिना किसी अतिश्योक्ति के) पहले निकला जाए वरना टाइम पर पहुँचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है कारण --- हर मुख्य चौराहे और रास्ते पर बेतहाशा - बेतरतीब जाम तेज़ धूप, चिलचिलाती गर्मी में घंटो जाम में फंसने का दर्द वही जानता है जिसने ये त्रासदी झेली हो इस स्थिति का असर धीरे - धीरे ज़हर सा फैलता जा रहा है पहले जहाँ रिक्शे और ऑटो वालों से झिक - झिक की नौबत कभी - कभार ही आती थी वहाँ अब शायद ही कोई दिन हो जब ऐसा होता हो लगता है सब पगला गए हैं धूल - धूप - गर्मी - जाम और घंटों की फजीहत से बौखलाए लोग जैसे दिमागी संतुलन खोते से जा रहे हैं एक तरह की मानसिक त्रासदी के शिकार होते जा रहे हैं सब के सब दिमाग और शरीर की ऊर्जा सडकों पर खोने के बाद घर पहुँचने पर इतनी हिम्मत भी बाकी नहीं रहती कि सुकून के चन्द पल घरवालों के साथ बिताये जा सके दिन भर दिलोज़ेहन में इकट्ठा तनाव और शोरगुल इस हालत में नहीं छोड़ता कि शाम के कुछ लम्हे चैन से गुज़ारे जाएँ

शनिवार, 8 मई 2010


केलेंडर बता रहे हैं कि नौ मई को मदर्स डे हैमाँ का दिन ... । अपने बच्चे के ही लिए जीने वाली , उसकी ही आँखों से सोने - जागने वाली , उसके ही सपनों पर कुर्बान होने वाली माँ को एक प्यार भरा आभार देने का दिन ... । जिस माँ से बस लेते ही लेते रहते हैं , उस माँ को एक नन्हा मगर दुलार भरा उपहार देने का दिन .... । सब अपनी -अपनी माँ को उपहार देने और उसे खुश करने की योजना बनाने में व्यस्त हैं और मैं ...........................
मैं सोच रही हूँ कि क्या दूँ माँ को , जो उस तक पँहुच जाये क्योकि मेरी माँ तो अब वहाँ है , जहां शायद मेरी आवाज़ भी नहीं पँहुच सकतीएक अजब सा खालीपन महसूस कर रही हूँ जिसे बाँट पाना मुमकिन ही नहीं हैजब मैं छोटी थी तब ऐसे पर्व नहीं होते थेअपनी माँ से बेपनाह मोहब्बत करने के बावजूद मैं उससे कभी नहीं कह सकी कि माँ मैं आपको बहुत प्यार करती हूँमैंने उसे कभी ये भी नहीं बताया कि उसके नहीं होने पर मेरी जिंदगी किस कदर अधूरी और ख़ाली हो जायेगीमैंने अपनी माँ को कभी आभार भरा उपहार या सुन्दर संदेशों वाला कार्ड नहीं दियाशायद हमेशा यही सोचा कि माँ तो सब जानती ही है , अगर नहीं जानती तो उसे जानना चाहिए ,आखिर वो माँ जो हैपता नहीं, माँ के रहते मैं कभी ये क्यों नहीं सोच पायी कि प्यार का एहसास कितना भी रूहानी सही मगर कभी - कभी शब्दों के माध्यम से उसकी अभिव्यक्ति भी अहमियत रखती हैकोई हमारे लिए कितना ज़रूरी है ये बताना कभी - कभी उसकी उम्र बढाने जैसा हो सकता हैमेरी माँ मेरे लिए कभी खुद से अलग इकाई नहीं रहीवो पहले भी मुझ में थी , आज भी है और तब तक रहेगी जब तक उसकी कोख में आकार लेने वाला मेरा शरीर ख़त्म नहीं हो जातालेकिन आज सोच रही हूँ तो लगता है कि हाँ मुझसे भूल हो गयीमुझे माँ से कहना चाहिए था, वो सब कुछ, जो मैं कहना चाहती थी उससेमुझे उसे बताना चाहिए था कि चाहे उसने मुझे अपने भीतर सिरजा हो , मगर मैं उसे अपने भीतर महसूस करती हूँमुझे माँ से कहना चाहिए था कि मेरे लिए सारी दुनिया में उससे ज्यादाख़ास, प्यारा और कीमती कोई था, होगामुझे माँ को बता देना चाहिए था कि ऊपर से चाहे मैं कितनी भी निश्चिन्त , निर्लिप्त दिखूं , लेकिन सच ये है कि उसके हर सुख - दुःख से मैं भीतर तक टूटती - जुड़ती, बनती - बिगड़ती हूँमुझे माँ को ये भरोसा भी ज़रूर दिलाना चाहिए था कि हालात ने ऊपर से भले ही मेरे रास्ते उससे अलग बना दिए हो मगर मेरा हर रास्ता उससे ही हो कर गुज़रता हैजिंदगी चाहे कितने भी रास्ते बदले मगर उसके ही लहू - अस्थि - मज्जा से बनी मैं उससे अलग नहीं होउगींहां...... मुझे माँ से ये सब कह देना चाहिए था,मगर मैंने नहीं कहा और आज ये एहसास मुझे बेतरह तकलीफ़ दे रहा है कि माँ ये सारा सच जाने बिना ही चली गयीदुनिया की हर माँ को अपने बच्चे से ये सुनने का हक़ है कि वो उसके लिए कितनी ख़ास है और मेरी माँ को उसका ये हक़ नहीं मिल सकाआज दुकानें हृदयस्पर्शी संदेशों वाले कार्डों से सजी हैं मगर मैं चाहूं तो भी उन्हें खरीदकर माँ तक नहीं पहुँचा सकतीमैं गिफ़्ट की दुकानों पर माँ के लिए सजे उपहारों को देखती हूँ और उदास हो जाती हूँदिख रही चीज़ें अचानक धुंधला जाती हैं और एहसास होता है कि कुछ आंसू सा कर अटक गया है

शुक्रवार, 7 मई 2010

कुदरत तुझे सलाम !

सात मई की सुबह एक अलग ही अनुभव ले कर आयीमैं सोच रही थी कि ये हंगामा सिर्फ मेरे शहर में ही बरपा मगर अगले दिन की ख़बरों से मालूम हुआ कि पूरा पूर्वांचल और हमारा पड़ोसी बिहार भी इसकी चपेट या कहें कि लपेट में थासुबह साढ़े छः बजे उठी तो सब ठीक - ठाक थारोज़ की तरह ... । लेकिन सात बजते - बजते '' दिन में रात हो गयी '' और फिर स्क्वाल (एक प्रकार का तूफ़ान ) नाम के बिन बुलाये अतिथि महोदय कुछ इस अंदाज़ में धमके कि मज़ा गयाबाद में मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से मालूम चला कि ये अतिथि महोदय दरअसल बिन बुलाये नहीं , बाकायदा निमंत्रित थेये बात दूसरी है कि ये निमंत्रण हमने नहीं , पिछले कुछ दिनों से लगातार बढ रही गर्मी और नमी के चलते खुद कुदरत का दिया हुआ थातभी तो ये इतने बिंदास तरीके से आये , गरजे, बरसे और बस मिनटों में हंगामा मचा कर गएसच कहती हूँ बहुत अद्भुत नज़ारा थातेज़ हवाएं , मूसलाधार बारिश ,तूफ़ान में बौराए झूम कर दोहरे हो रहे पेड़ , हवा के तूफानी वेग से उखड़ कर यहाँ - वहाँ उड़ रहे - गिर रहे लोहे के बड़े - बड़े होर्डिंग्स , बिजली के खभे और पेड़ों के मोटे - मोटे तनेये भी इत्तेफ़ाक था कि मैं ठीक उसी वक्त सुबह की ड्यूटी पर जाने के लिए रास्ते में थी शायद इसीलिए इस नज़ारे को और भी करीब से महसूस कर सकीलगता था कि किसी भी वक्त कोई पेड़ या होर्डिंग उखड़ कर गाड़ी पर गिरेगाईश्वर की कृपा से मैं तो सुरक्षित गंतव्य तक पहुँच गयी लेकिन इस तूफ़ान ने कितना कहर ढाया ये तो अगले दिन के अखबार से पता चलाउस बर्बादी का ब्यौरेवार वर्णन करना नहीं चाहती लेकिन ये ज़रूर सोच रही हूँ कि ............ सच कितनी ताकत होती है कुदरत में और जब वो ताकत जगती है तो हमारी सारी शक्ति , सारी ताकत पनाह मांगने लगती हैफिर भी कितने दुस्साहसी होते हैं हम इंसान भी , बार - बार कुदरत को छेड़ना नहीं छोड़तेज़रा सोचिये, इस छेड़- छाड़ से कुपित हो कर जिस दिन ये कुदरत अपने प्रकोप का तीसरा नेत्र खोल देगी, उस दिन हमारा क्या होगा ?

गुरुवार, 6 मई 2010

देर आया ,क्या दुरुस्त भी आयेगा ??????????/


वैसे तो संसार का हर धर्म दया , करुणा और क्षमा की शिक्षा देता है और विशेषकर हम भारतीय इस शिक्षा को सही अर्थो में आत्मसात भी करते रहे हैं ,मगर कभी - कभी अन्याय और अत्याचार उन हदों के पार चला जाता है जहाँ किसी भी नैतिक शिक्षा की कोई भूमिका नहीं रह जाती वहाँ होता है सिर्फ क्रोध , तिलमिलाहट तीव्र आक्रोश और रगों में सुलगता लावा जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिशोध लेना और अत्याचारी को दंड देना चाहता है २६/११ को भारत की अस्मिता पर हुए आतंकी हमले के बाद शायद हर भारतीय ने ही अपनी रगों में इसी लावे को पिघलता महसूस किया है । ऊपर से सितम ये कि अपनी - अपनी जगह रह कर - रुक कर सिवाय देखते रहने के कुछ किया भी नहीं जा सकता क्योकि दंड देना एक कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके अपने तरीके हैं, प्रावधान हैं , जिनमे समय लगता है , प्रतीक्षा करनी पड़ती है शुक्र है कि प्रतीक्षा - काल बीता और छः मई , २०१० को वो फैसला ही गया जिस पर पूरे देश की नज़र टिकी थी अजमल कसाब को अंततः सज़ा--मौत का फ़र्मान सुना दिया गया ये वो शख्स है जिसकी बेरहमी ने ऐसा कहर बरपा किया था जिसमे जाने कितनी जिंदगियां ख़त्म हो गयीं , कितनी बर्बाद हो गयीं और कितनी ही हमेशा - हमेशा के लिए जिंदा लाशों में तब्दील हो गयीं एक ऐसा जुर्म , जिसके लिए रहम की सोचना भी गुनाह सरीखा है अदालत ने मुजरिम को वही सज़ा दी , जिसका वो हकदार था फ़ैसला आने में वक्त लगा , मगर आया तो मन को ठंडक मिली लेकिन .............
बात अभी खत्म पर नहीं पहुंची है ये फैसला तो कुछ देर के लिए दर्द का एहसास भुला देने वाली दर्दनिवारक दवा की गोली जैसा है ,दर्द का पूरा इलाज नहीं और अब सवाल है यही कि क्या ....... दर्द का पूरा इलाज होगा ? कसाब की अंधी दरिंदगी ने जिन जिंदगियों को हमेशा के लिए अंधे कुएं में धकेल दिया , क्या...... उन्हें न्याय मिलेगा ?
क्या इस सज़ा के फ़ैसले पर अमल होगा ?
या फिर --------------------------------------------------- ???


सोमवार, 26 अप्रैल 2010

उसने कहा है ...

चर्चा है कि सोशल नेटवर्किंग साईट्स बड़े लोगों की नोक -झोक और लड़ाई का नया मैदान बन चुकी हैंकिसी को किसी के भी लिए कुछ भी कहना हो , शोले उगलने हों या फिर फूल बरसाने हों , आज की तारीख़ में सबसे अच्छा तरीका है , अपनी नेटवर्किंग साईट पर जाना और सारी भड़ास निकाल देनायही वो माध्यम है जहां आपकी बात बिलकुल उसी प्रारूप में छप जाती है ,जैसा आप कहना चाहेंवो भी बिना किसी संपादन के ,सिर्फ एक क्लिक परअपने को अभिव्यक्त कर पाना सचमुच इतना आसान कभी नहीं थामुझे लगता है इस विषय पर नकारात्मक दृष्टिकोण की बजाय सकारात्मक तरीके से रिएक्ट किया जाना चाहिएआखिर बात चाहे जैसी क्यों हो , पहुँच तो अपने मूल रूप में ही रही है और ये एक शुभ लक्षण कहा जा सकता हैये स्थिति उन दिनों से तो अच्छी ही कही जाएगी जब सेलिब्रिटीज़ और आम लोगों के बीच में एक ख़ास जमात होती थी, जिन पर उन बड़े लोगो की बात को आम जनता तक पहुँचाने का जिम्मा हुआ करता था और जिनके हाथों में किसी भी बात को किसी भी हद तक तोड़मरोड़ कर अपने तरीके से पेश कर देने की विध्वंसकारी ताकत भी ... । कहा कुछ जाता था और लोगों तक पहुँचाया कुछ और जाता थाइस सबके पीछे अपने -अपने निहित स्वार्थों की भूमिका हुआ करती थी और बेचारा कहने वाला दिनों , महीनों , सालों तक सफाई देता फिरता था कि उसने ऐसा नहीं कहा या फिर उसके कहने का वो मलतब नहीं थाबेचारी जनता अलग ही कन्फ्यूज़न में पड़ी रहती थी कि किसे सही माने, किसे गलतये स्थिति अगर सौ फ़ीसदी सच नहीं तो पचास फ़ीसदी तो थी हीसमय बदला और समय के साथ हमारे कहने - सुनने के तरीके भी बदलेआज बात चाहे हमारे महानायक की हो , सुपर हीरो की हो , मनपसन्द खिलाडी की हो , या हो किसी विवादित हस्ती की , उनके ब्लॉग पर जाईये और जान लीजिये वो सब कुछ जो वो अपने पक्ष में आपसे कहना चाहते हैंउन्हीं के भाव ,उन्हीं के विचार , उन्हीं के शब्दों में , बिना किसी दूसरे की मिलावट के . हाँ , बात में खुद कहने वाले ने सच - झूठ की कितनी मात्रा का इस्तेमाल किया है ये परखना आपके विवेक पर निर्भर करता है लेकिन कम से कम आप इतना निश्चिन्त तो हो ही सकते हैं कि जो कुछ आप पढ़ रहे है ये उसी की अभिव्यक्ति है , जिसके नाम पर आप पढ़ रहें हैं ।निश्चित रूप से अभिव्यक्ति की ये पारदर्शिता स्वागत और प्रशंसा के योग्य है ।
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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

क्या सचमुच गुम जाएगी पाती ...?

अब भी अच्छी तरह याद हैं बचपन के वो दिनकोमल सपनों के मन की डाल पर फरने के दिनसब कुछ कितना सुन्दर थावो हर रिश्ता, हर नाम , हर चीज़ , जो मन के पास थी , आस-पास थी , मानों ज़िन्दगी का ही हिस्सा थीजैसे उनके ही दम पर जीवन चल रहा होउनके बगैर भी जीवन है ये सोचना भी असंभव थाउनमें से ही एक था मोहल्ले का डाकिया और उसकी लाई हुयी चिट्ठियाँ । इंतज़ार के वो भी क्या हसीं पल थे । नानी की , मासी की ,सबसे बढ कर दोस्तों की चिट्ठियाँ , जो रहते तो अपने ही शहर में थे लेकिन उनसे भी बात करने लिए नीले अंतर्देशीय और पीले पोस्टकार्ड का सहारा लेना बेहद आत्मीय और सहज लगता था । अब की तरह घंटों मोबाइल से चिपके रहने का तो सवाल ही नहीं था ,क्योंकि मोबाइल ही नहीं था । तब स्कूल से लौट कर माँ से पूछना - '' कोई चिट्ठी आई क्या ?'' और जवाब में ' नहीं ' मिलने पर धूप वाली खड़ी दोपहरी में दरवाज़े पर जा कर डाकिये की राह देखना .... , क्या आनंद था उसमें , ये व्यक्त करना शब्दों के बस का नहीं । चिट्ठी में क्या लिखा है , उसका सुख तो पढ़ कर मिलता , लेकिन लिफाफे को छूने का सुख उससे कहीं बढ कर होता , मानों लिखने वाले के हाथ की खुशबू सीधे हम तक आ पंहुची हो । कॉलेज तक ये सिलसिला चलता रहा । फिर मानों समय ने अपनी जादुई झाड़ू फेरी हो , सालों कैसे बीत गए ,पता ही नहीं चला । सब कुछ बदलता रहा और पिछले पांच - छः सालों में तो इस बदलाव की गति कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गयी । इस गति के बहाव में सबके साथ हम भी बहे इसलिए कुछ बदलता सा महसूस नहीं हुआ , लेकिन कल अचानक बहुत दिनों बाद मोबाइल पर विविध भारती सुन रही थी । फरमाईशी गानों का कार्यक्रम चल रहा था और फरमाईशें थीं एस ० एम० एस ० के ज़रिये । बेशक अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप विविध - भारती पर बज रहे गाने बहुत कर्णप्रिय थे लेकिन मेरे मन की किसी सतह पर कहीं और कुछ और ही याद बज रही थी । याद आ रहे थे आकाशवाणी के वो दिन , फरमाईशी प्रोग्राम के लिए आने वाली चिट्ठियों के वो ढेर के ढेर और हमारा घंटों वो पत्र छांटना ... । एक ही श्रोता परिवार के बीसियों पोस्टकार्ड देखना और कहना - '' हे भगवान ! कैसे दीवाने लोग हैं ? पता नहीं इतना टाइम कैसे निकाल लेते हैं ? '' और सच कहूं फरमाईशों के एस ० एम ० एस ० के बीच मुझे अचानक ही वो दीवाने लोग बेहद याद आने लगे । ... तो विविध - भारती से भी चिट्ठियाँ गयी ? हम तो पहले ही आधुनिकता की दुहाई दे कर एक क्लिक पर बात कह डालना सीख चुके थे । अब कोई दीवानगी में डूब कर किसी को पाती पर पाती नहीं भेजा करेगा । किसी के पास समय नहीं। न लिखने का, न पढने का । शार्ट मैसेजेज़ और मेल्स का ज़माना है और यही शायद अब हमारी ज़रुरत भी । वैसे तो इस पूरे किस्से में बदलने वालों में हमारा भी नाम आता है लेकिन जाने क्यों मन में हूक सी उठी । कार्यक्रम के स्वरुप में ये बदलाव निश्चित रूप समय के साथ कदम से कदम मिलाने के लिए किया गया है लेकिन ये बदलाव मन को सोचने पर मजबूर कर गया । अब क्या सचमुच गुम जाएगी पाती ? और शायद साथ ही साथ गुम जायेगे पाती लिखने वाले और पाती पा कर उसमें लिखने वाले किसी अपने के हाथों की खुशबू खोजने वाले दीवाने लोग ... !

अवसाद के भय से जूझता मध्यमवर्ग !

शायद आपको पता हो कि भारतीय समाज में पाया जाता है एक 'मध्यमवर्गीय तबका'। उच्च वर्ग की तरह  कई पीढ़ियों के जीवनयापन की चिंताओं से मुक...